सीनियर सिटिज़न से जुड़ी कार्यवाही मौत के साथ खत्म हो जाती है, बचे हुए पक्ष सिविल फोरम में पारिवारिक समझौते के विवाद को आगे बढ़ा सकते हैं: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

Update: 2026-07-15 14:20 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत शुरू की गई कार्यवाही वरिष्ठ नागरिक की मौत के बाद जारी नहीं रहती, क्योंकि ऐसी कार्यवाही का मुख्य आधार ही उनकी मौत के साथ खत्म हो जाता है। [2026 LiveLaw (PH) 235]

जस्टिस कीर्ति सिंह ने कहा,

"इस अधिनियम के तहत कार्यवाही का मकसद वरिष्ठ नागरिकों के जीवनकाल में उनके कल्याण को सुनिश्चित करना है। जिस वरिष्ठ नागरिक के कहने पर ऐसी कार्यवाही शुरू की गई, उनके न रहने पर कार्यवाही का मूल आधार ही खत्म हो जाता है। सिर्फ़ इस बात से कि कार्यवाही में पारिवारिक समझौते या मध्यस्थता फैसले (arbitral award) की वैधता भी शामिल थी, कार्यवाही का मूल स्वरूप नहीं बदलता।"

कोर्ट ने उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 'मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल' और 'अपीलीय ट्रिब्यूनल' के आदेशों को चुनौती दी गई; इन ट्रिब्यूनल ने मूल आवेदक की मौत के बाद मामले पर विचार करने से इनकार किया।

याचिकाकर्ता दीपक जैन ने 'मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल' (2020) के उस आदेश को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया, जिसमें निजी पक्षों के बीच हुए पारिवारिक समझौते और मध्यस्थता फैसले को रद्द कर दिया गया। याचिका में 'अपीलीय ट्रिब्यूनल' (2023) के आदेश को भी चुनौती दी गई, जिसने वरिष्ठ नागरिक दर्शन लाल जैन की मौत के बाद उनकी अपील बेकार (infructuous) मानकर खारिज किया था।

यह तर्क दिया गया कि विवाद मूल रूप से सिविल प्रकृति का था और पारिवारिक समझौते व मध्यस्थता फैसले की वैधता से संबंधित था, न कि भरण-पोषण से। याचिकाकर्ता का तर्क था कि वरिष्ठ नागरिक की मौत के बाद भी ऐसे मुद्दों पर मेरिट के आधार पर फैसला किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता के तर्कों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि 2007 के अधिनियम के तहत कार्यवाही व्यक्तिगत प्रकृति की होती है और इसका मकसद वरिष्ठ नागरिकों को उनके जीवनकाल में सुरक्षा देना है; वरिष्ठ नागरिक की मौत होने पर कानून के तहत कार्रवाई का आधार (cause of action) खत्म हो जाता है; संपत्ति विवादों का इसमें शामिल होना अधिनियम के तहत कार्यवाही की प्रकृति को नहीं बदलता है।

कोर्ट ने आगे कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए वह तथ्यों की दोबारा जांच के लिए अपीलीय अथॉरिटी के तौर पर काम नहीं करता, जब तक कि अधिकार क्षेत्र की गलती, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन या स्पष्ट गैर-कानूनी बात न हो। मौजूदा मामले में ऐसा कोई आधार नहीं पाया गया।

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पक्षकार अपने मालिकाना हक के निपटारे के लिए उचित सिविल कानूनी उपाय अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं।

Title: Deepak Jain v. District Magistrate and Chairman Appellate Tribunal, Yamunanagar and others

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