अपील में दोषसिद्धि बरकरार रहने के बाद भी हो सकता है चेक बाउंस मामले में समझौता: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act ) की धारा 138 के तहत चेक अनादरण (चेक बाउंस) के मामलों में अपील में दोषसिद्धि बरकरार रहने के बाद भी समझौता किया जा सकता है। यदि पक्षकार आपसी सहमति से विवाद सुलझा लेते हैं तो हाईकोर्ट अपने अंतर्निहित अधिकारों का प्रयोग करते हुए दोषसिद्धि को भी निरस्त कर सकता है।
जस्टिस सुमीत गोयल ने यह भी स्पष्ट किया कि समझौते के समय सामान्यतः लगाए जाने वाले खर्च (कॉस्ट) को माफ करने का अधिकार अदालतों के पास है, लेकिन इसका इस्तेमाल केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट अपने अंतर्निहित अधिकारों का प्रयोग करते हुए दोषसिद्धि रद्द कर सकता है, बशर्ते पक्षकारों के बीच वास्तविक और स्वैच्छिक समझौता हुआ हो तथा उससे सार्वजनिक हित या न्याय के उद्देश्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़ता हो।
खंडपीठ ने कहा कि NI Act के तहत उपलब्ध उपाय का क्षतिपूरक उद्देश्य उसके दंडात्मक उद्देश्य पर प्राथमिकता रखता है।
यह टिप्पणी सोनीपत के मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र में हुए समझौते के बाद चेक बाउंस मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की दो पुनरीक्षण याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गई।
अदालत ने NI Act की धारा 147, BNSS की धारा 359 तथा धारा 528 और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि चेक बाउंस के मामलों में मुकदमे के हर चरण पर समझौता किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा,
"NI Act की धारा 138 के तहत अपराध का समझौता मुकदमे के हर स्तर पर किया जा सकता है, यहां तक कि तब भी जब मजिस्ट्रेट द्वारा दोषसिद्धि और सेशन कोर्ट द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंच चुका हो।"
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कॉस्ट माफ करने की शक्ति का प्रयोग नियमित रूप से नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने कहा,
"कॉस्ट माफ करने का विवेकाधिकार सामान्य नियम के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इसका प्रयोग केवल असाधारण, ठोस और विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता है। यदि अदालत कॉस्ट माफ करती है तो उसे इसके स्पष्ट और ठोस कारण अपने आदेश में दर्ज करने होंगे।"
अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था चेक लेनदेन की विश्वसनीयता बनाए रखने और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने के विधायी उद्देश्य के अनुरूप है।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 528 के तहत उसे प्राप्त अंतर्निहित शक्तियां न्याय के हितों की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
अदालत ने कहा,
"यदि हाईकोर्ट के पास ये अंतर्निहित शक्तियां न हों तो उसे कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होते हुए असहाय होकर देखना पड़ेगा। ये शक्तियां हाईकोर्ट की मूल प्रकृति और अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं।"
मामले में याचिकाकर्ता को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, सोनीपत ने दो चेक बाउंस मामलों में दोषी ठहराते हुए एक वर्ष छह माह के कठोर कारावास और मुआवजा देने की सजा सुनाई थी। बाद में एडिशनल सेशन जज, सोनीपत ने भी उसकी अपील खारिज कर दी थी।
इसके बाद हाईकोर्ट में लंबित पुनरीक्षण याचिकाओं के दौरान दोनों पक्षों ने मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र, सोनीपत में विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान कर लिया। शिकायतकर्ता ने भी अदालत में समझौते की पुष्टि करते हुए दोषसिद्धि समाप्त करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
समझौता स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट और अपीलीय अदालत के दोषसिद्धि एवं सजा संबंधी आदेशों को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को बरी कर दिया। साथ ही दोनों पक्षों को समझौते की शर्तों का पालन करने का निर्देश दिया।
हालांकि अदालत ने दोहराया कि मुकदमे के अंतिम चरण में समझौता होने पर सामान्यतः कॉस्ट लगाया जाता है, लेकिन इस मामले में यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता वर्ष 2014 से आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहा था और मामले के तथ्य विशेष थे, उसने अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए कॉस्ट माफ की।