पहली शादी कायम होने का आरोप अपने आप में दूसरी शादी से भरण-पोषण रोकने का आधार नहीं: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

Update: 2026-08-12 11:58 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला की पहली शादी के कायम होने का आरोप अपने आप में उसे दूसरी शादी से भरण-पोषण पाने के अधिकार से वंचित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का प्रावधान सामाजिक न्याय का उपाय है और केवल तकनीकी आधार पर इसका लाभ नहीं रोका जा सकता।

जस्टिस मनदीप पन्नू ने यह टिप्पणी उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें पति ने अपनी पत्नी को दिए गए भरण-पोषण को चुनौती दी थी।

फैमिली कोर्ट ने पत्नी को हर महीने 5,000 रुपये और नाबालिग बच्चे को 2,500 रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। पत्नी ने 30,000 रुपये मासिक भरण-पोषण की मांग की थी।

मामले में पति का मुख्य तर्क था कि उससे विवाह के समय महिला की पहली शादी पहले से कायम थी। इसलिए दूसरी शादी कानूनी रूप से वैध नहीं थी और महिला धारा 125 के तहत उससे भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्ष काफी लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे और उनके संबंध से एक बच्चे का भी जन्म हुआ। ऐसी परिस्थितियों में केवल पहली शादी के कायम होने का आरोप महिला के भरण-पोषण के दावे को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

“ऐसी आपत्ति को अपने आप में धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण मांगने वाली महिला को उसके दावे से वंचित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के फैसले एन. उषा रानी बनाम मूडुदुला श्रीनिवास का भी उल्लेख किया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए माना था कि पहली शादी के तलाक के बिना भी महिला दूसरी शादी से भरण-पोषण मांग सकती है, विशेष रूप से तब जब वह पहले पति से वास्तविक रूप से अलग रह रही हो, पहली शादी से कोई अधिकार या लाभ प्राप्त नहीं कर रही हो और दूसरे पति को परिस्थितियों की जानकारी होने के बावजूद उसने उसके साथ संबंध स्थापित किया हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता सामाजिक न्याय का प्रावधान है और “जहां परिस्थितियां भरण-पोषण दिए जाने को उचित ठहराती हों, वहां तकनीकी आधार पर इसके लाभ को समाप्त नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि पत्नी शिक्षित है और पहले शिक्षक के रूप में काम कर चुकी है, इसलिए वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण का अधिकार तय करते समय पक्षकारों की वास्तविक आर्थिक स्थिति, साधन और कानून में निर्धारित परिस्थितियों को देखा जाना चाहिए।

मामले में पत्नी का आरोप था कि उसे ससुराल में प्रताड़ित किया गया, दहेज की बार-बार मांग की गई और उसे वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। उसका कहना था कि पति के पास पर्याप्त साधन होने के बावजूद उसने पत्नी और बच्चे का भरण-पोषण नहीं किया।

पति ने यह भी दलील दी कि इसी कारण से पहले दायर की गई भरण-पोषण की याचिका डिफॉल्ट के कारण खारिज हो चुकी थी। हाईकोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया।

कोर्ट ने कहा कि डिफॉल्ट के कारण किसी याचिका का खारिज होना और मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला होना पूरी तरह अलग बातें हैं। पति यह साबित नहीं कर सका कि पिछली कार्यवाही में पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार पर गुण-दोष के आधार पर कोई अंतिम फैसला हुआ था। इसलिए केवल गैर-हाजिरी या अभियोजन न चलाने के कारण पिछली याचिका के खारिज होने को नई कार्यवाही के खिलाफ रोक नहीं माना जा सकता।

पहली शादी कायम होने के कारण दूसरी शादी को शून्य बताने वाली दलील पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के साविताबेन सोमाभाई भाटिया बनाम गुजरात राज्य के 2005 के फैसले का भी उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा कि उस फैसले में दूसरी पत्नी के भरण-पोषण के दावे को उसके सामने मौजूद तथ्यों के आधार पर खारिज किया गया, लेकिन बाद में एन. उषा रानी के फैसले में इस कानूनी स्थिति पर विस्तार से विचार किया जा चुका है।

हाईकोर्ट ने चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 'पत्नी' की अवधारणा की व्यापक व्याख्या की थी और कहा था कि किसी पुरुष को लंबे समय तक वैवाहिक संबंध जैसे संबंध का लाभ उठाकर उससे जुड़ी जिम्मेदारियों से बचने के लिए कानूनी खामियों का फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी और बच्चे के लिए निर्धारित भरण-पोषण की राशि को बरकरार रखा।

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