कानूनी वारिस, मृतक ट्रस्टी द्वारा 'रिप्रेजेंटेटिव कैपेसिटी' में दायर मुकदमे को आगे नहीं बढ़ा सकते; यह अधिकार जीवित ट्रस्टी के पास होता है: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

Update: 2026-06-18 14:48 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक ट्रस्टी के कानूनी वारिसों को उस मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए पक्षकार नहीं बनाया जा सकता, जिसे ट्रस्टी ने 'रिप्रेजेंटेटिव कैपेसिटी' (प्रतिनिधि के तौर पर) में दायर किया। कोर्ट ने दोहराया कि ऐसे मुकदमे को आगे बढ़ाने का अधिकार केवल जीवित या विधिवत नियुक्त ट्रस्टियों के पास होता है। [2026 LiveLaw (PH) 200]।

जस्टिस विकास बहल ने रिवीजन याचिका खारिज की, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसमें मृतक वादी के कानूनी वारिस को प्रतिस्थापित (substitution) करने से इनकार कर दिया गया।

यह मामला श्रीमती अशर्फी देवी और एक अन्य व्यक्ति द्वारा 'जनहित सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट' के कामकाज के संबंध में दायर सिविल मुकदमे से जुड़ा था। अशर्फी देवी ट्रस्ट की ट्रस्टी/संरक्षक थीं, कार्यवाही के दौरान चल रहे मुकदमे के बीच ही गुजर गईं।

उनकी बेटी ने 'कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर' (दीवानी प्रक्रिया संहिता) के ऑर्डर 22 नियम 3 के तहत अपनी मां के कानूनी प्रतिनिधि के तौर पर मुकदमे में शामिल होने के लिए आवेदन दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने आवेदन खारिज कर दिया और कहा कि मुकदमा मृतक ने ट्रस्टी के तौर पर दायर किया था, न कि अपनी व्यक्तिगत हैसियत से।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि मृतक की बेटी होने के नाते, उन्हें मुकदमा जारी रखने की अनुमति दी जानी चाहिए और अगर ऐसा बदलाव (substitution) किया जाता है तो प्रतिवादियों को कोई नुकसान नहीं होगा।

इस दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के तर्क को सही ठहराया और कहा कि मुकदमा अशर्फी देवी ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत से नहीं, बल्कि ट्रस्ट के ट्रस्टी के तौर पर दायर किया था।

यह एक स्थापित सिद्धांत है कि ट्रस्टी का हित कानूनी वारिसों को नहीं मिलता, बल्कि जीवित या नए नियुक्त ट्रस्टियों को हस्तांतरित होता है। जज ने कहा कि कानूनी प्रतिनिधि तब तक ट्रस्टी की जगह नहीं ले सकते जब तक कि उन्हें ट्रस्ट की योजना के तहत विधिवत नियुक्त न किया गया हो।

कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 'सीताबाई रामचंद्र जलतारे बनाम मस्जिद नूरुन मोहल्ला जिंगरवाड़ी' (AIR 1979 Bom 109) मामले के फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया कि जिन मामलों में मुकदमा 'रिप्रेजेंटेटिव कैपेसिटी' (प्रतिनिधि के तौर पर) में दायर किया जाता है, वहां कानूनी वारिस कार्यवाही को तब तक आगे नहीं बढ़ा सकते जब तक कि वे उचित नियुक्ति के माध्यम से ट्रस्टी की भूमिका न संभाल लें। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि ऐसे मामले CPC के ऑर्डर 22 रूल 10 (हित का हस्तांतरण) के तहत आते हैं, न कि CPC के ऑर्डर 22 रूल 3 (कानूनी प्रतिनिधि) के तहत।

कोर्ट ने 'शालिनी श्याम शेट्टी बनाम राजेंद्र शंकर पाटिल (2010) 8 SCC 329' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए संविधान के आर्टिकल 227 के तहत दखल देने के सीमित दायरे को भी दोहराया। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि सुपरवाइज़री अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल बहुत कम मामलों में ही किया जाना चाहिए और इसे अपील के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई गड़बड़ी न पाते हुए कोर्ट ने माना कि आर्टिकल 227 के तहत दखल देने की कोई ज़रूरत नहीं है और रिविज़न याचिका को बिना किसी ठोस आधार के ख़ारिज किया।

Title: Poonam @ Indira v. Prahlad Sharma and others

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