गिरफ्तारी वही मानी जाएगी जब स्वतंत्रता छीनी जाए, न कि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज समय से: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी उस समय से मानी जाएगी, जब उसकी स्वतंत्रता वास्तव में सीमित हो जाती है न कि जब पुलिस अपने रिकॉर्ड में गिरफ्तारी का समय दर्ज करती है। अदालत ने कहा कि पुलिस दस्तावेजों में दर्ज समय अंतिम प्रमाण नहीं है बल्कि असली कसौटी यह है कि व्यक्ति की आवाजाही की स्वतंत्रता कब रोकी गई।
जस्टिस सुमीत गोयल इस मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें याचिकाकर्ता अनुज कुमार सिंह ने अपनी गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए रिहाई की मांग की। उनका कहना था कि उन्हें 24 घंटे से अधिक समय तक बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए हिरासत में रखा गया।
मामला मादक पदार्थ कानून से जुड़े एक जांच से संबंधित है, जिसमें आरोप है कि कुछ कंपनियों के माध्यम से प्रतिबंधित दवाओं का अवैध उपयोग किया जा रहा है। जांच एजेंसी का दावा है कि याचिकाकर्ता 31 अक्टूबर, 2025 को स्वेच्छा से उनके साथ देहरादून से चंडीगढ़ आए और 1 नवंबर 2025 को रात 9 बजे औपचारिक रूप से गिरफ्तार किए गए। वहीं याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्हें 31 अक्टूबर की रात से ही लगातार हिरासत में रखा गया।
हाईकोर्ट ने घटनाक्रम का विश्लेषण करते हुए पाया कि याचिकाकर्ता 31 अक्टूबर की रात करीब 11 बजे से जांच एजेंसी के नियंत्रण में थे, उनके साथ यात्रा की और लगातार उनकी निगरानी में रहे। अदालत ने कहा कि इस तरह की स्थिति में व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है और इसे ही हिरासत माना जाएगा चाहे एजेंसी इसे औपचारिक गिरफ्तारी माने या नहीं।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 22(2) और संबंधित कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक बिना न्यायिक अनुमति के हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने कहा,
“गिरफ्तारी उस क्षण मानी जाएगी, जब व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से चलने-फिरने की क्षमता समाप्त हो जाती है और वह पूरी तरह अधिकारियों के नियंत्रण में आ जाता है। पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज समय केवल औपचारिकता है इसे वास्तविक गिरफ्तारी का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।”
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को निर्धारित 24 घंटे से अधिक समय तक बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए हिरासत में रखा गया जो कानून और संविधान दोनों का उल्लंघन है।
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता की रिहाई का आदेश दिया और कहा कि उसकी हिरासत अवैध है।