'साइबर क्राइम साइलेंट वायरस जैसा': पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 'डिजिटल अरेस्ट' मामले में आरोपी की अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी खारिज की
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि देश में साइबर क्राइम "साइलेंट वायरस की तरह काम करता है," जो चुपके से फैलता है, नुकसान पहुंचाता है और समाज पर ऐसा असर डालता है, जो सिर्फ़ पैसों के नुकसान से कहीं ज़्यादा गहरा होता है।
समाज और वित्तीय संस्थानों पर ऐसे अपराधों के दूरगामी प्रभावों को देखते हुए कोर्ट ने 23 साल के एक युवक की अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी खारिज की। इस युवक पर एक महिला को "डिजिटल अरेस्ट" करने का आरोप था, जिसमें महिला से ₹6 करोड़ से ज़्यादा की रकम जमा करने के लिए कहा गया।
जस्टिस सुमीत गोयल ने अपने आदेश में ये बातें कही हैं:
"...ज़मानत की अर्ज़ियों पर फ़ैसला सुनाते समय खासकर साइबर क्राइम और ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में कई अहम बातों की बहुत बारीकी से जांच करना ज़रूरी होता है। इनमें सबसे अहम है अपराध की गंभीरता और उसका समाज पर पड़ने वाला संभावित असर। ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर क्राइम का बढ़ता जाल एक बड़ा खतरा है, क्योंकि यह धीरे-धीरे डिजिटल वित्तीय लेन-देन के प्लेटफ़ॉर्म पर लोगों के भरोसे को खत्म करता जाता है। भरोसे का यह टूटना एक उन्नत और डिजिटल रूप से सशक्त "डिजिटल भारत" की उम्मीदों के खिलाफ़ है। इसलिए ऐसे मामलों में कोर्ट को बहुत ज़्यादा सावधानी बरतने की ज़रूरत होती है। इन अपराधों की एक खासियत यह है कि ये अक्सर एक ही हरकत से एक साथ कई लोगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। साइबर क्राइम के बुरे नतीजे सिर्फ़ किसी एक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि ये कई ऐसे नागरिकों को भी खतरे में डाल देते हैं जिन्हें इसकी भनक तक नहीं होती।
इसलिए ऐसे अपराधों की गंभीरता को कम करके नहीं आंका जा सकता। ये न सिर्फ़ लोगों की वित्तीय सुरक्षा और वित्तीय लेन-देन के गेटवे और प्लेटफ़ॉर्म पर उनके भरोसे को खतरे में डालते हैं, बल्कि पूरे समाज को भी ऐसे ही खतरों के सामने ला खड़ा करते हैं। सच तो यह है कि हमारे देश में साइबर क्राइम एक साइलेंट वायरस की तरह काम करता है — जो चुपके से फैलता है, नुकसान पहुंचाता है और समाज पर ऐसा असर डालता है, जो सिर्फ़ पैसों के नुकसान से कहीं ज़्यादा गहरा होता है; यह हमारे समाज के मूल आधार — भरोसे, सुरक्षा और राष्ट्रीय प्रगति — को ही खतरे में डाल देता है। इन अपराधों की मूल प्रकृति और उनकी गहरी गंभीरता को देखते हुए और समाज तथा वित्तीय संस्थानों — दोनों पर पड़ने वाले उनके दूरगामी प्रभावों को ध्यान में रखते हुए यह कोर्ट आरोपी को अग्रिम ज़मानत देने के पक्ष में नहीं है। अगर ऐसा किया जाता है तो इसका मतलब होगा कि हम इन "डिजिटल अपराधों" के गहरे और दूरगामी बुरे प्रभावों को जान-बूझकर नज़रअंदाज़ कर रहे हैं।"
कोर्ट ने पाया कि एक महिला की 'डिजिटल गिरफ्तारी' से जुड़े इस मामले में याचिकाकर्ता पर गंभीर आर्थिक अपराध - यानी साइबर धोखाधड़ी - के आरोप हैं, जिसमें ₹6.80 करोड़ की बड़ी रकम शामिल है।
कोर्ट ने कहा कि भले ही FIR में याचिकाकर्ता का नाम नहीं है, लेकिन जांच के दौरान उसकी संलिप्तता सामने आई है। इस चरण पर जांच एजेंसी द्वारा जुटाए गए सबूत "प्रथम दृष्टया" (Prima Facie) यह संकेत देते हैं कि उसका "सह-आरोपियों और कथित लेन-देन के साथ कोई संबंध" है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज किया कि यह मामला पूरी तरह से सह-आरोपियों के बयानों पर आधारित है। कोर्ट ने कहा कि जांच अभी भी जारी है और हर आरोपी की भूमिका को एक बड़ी साजिश के संदर्भ में जांचना ज़रूरी है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की उस अपील को भी खारिज किया, जिसमें उसने जमानत पर बाहर सह-आरोपियों के साथ समानता (Parity) की मांग की थी; कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता पर जो भूमिका होने का आरोप है, वह काफी विशिष्ट (Specific) प्रतीत होती है।
कोर्ट ने फैसला सुनाया,
"पुलिस ने आगे यह भी कहा कि आरोपियों के काम करने के तरीके (Modus Operandi) का प्रभावी ढंग से पता लगाने, इस धोखाधड़ी में शामिल व्यापक नेटवर्क की पहचान करने और गबन की गई रकम को बरामद करने के लिए याचिकाकर्ता से हिरासत में पूछताछ करना बेहद ज़रूरी है। इस अपराध की प्रकृति और गंभीरता - जिसमें संगठित साइबर अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है - को देखते हुए एक गहन जांच की आवश्यकता है; और इस चरण पर, याचिकाकर्ता को हिरासत में लिए बिना यह जांच पूरी नहीं की जा सकती... इस चरण पर रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह कहा जा सके कि याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता। रिकॉर्ड में आए सबूत और शुरुआती जांच से यह प्रतीत होता है कि आरोपों के लिए एक उचित आधार मौजूद है। इसलिए याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत देना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे निश्चित रूप से प्रभावी जांच में बाधा उत्पन्न होगी।"
Case title: Aayush Malhotra v/s State of Haryana