2017 डेरा हिंसा: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने राम रहीम के समर्थकों को बरी करने के फैसले को सही ठहराया
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार की उस अपील को खारिज किया, जिसमें डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के चार समर्थकों को बरी किए जाने को चुनौती दी गई। इन समर्थकों पर अगस्त 2017 में डेरा प्रमुख को दोषी ठहराए जाने के बाद भड़की हिंसा के दौरान कैथल के कलायत में उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड (UHBVN) के ऑफिस में तोड़फोड़ करने और आग लगाने का आरोप था। [2026 LiveLaw (PH) 230]
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष न तो आरोपियों की पहचान साबित कर पाया और न ही उन पर लगाए गए अपराधों (जैसे देशद्रोह, आगजनी और नुकसान पहुंचाना) के लिए जरूरी कानूनी तत्व साबित कर पाया।
जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की डिवीजन बेंच ने कहा:
"ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादियों को सिर्फ़ छोटी-मोटी विसंगतियों के आधार पर बरी नहीं किया, बल्कि यह बरी करने का फैसला ठोस विरोधाभासों, अहम जानकारियों के छूटने, संदिग्ध बरामदगी, भरोसेमंद पहचान की कमी, असंगत जांच, फोरेंसिक पुष्टि के अभाव और प्रतिवादियों पर लगाए गए कई अपराधों के कानूनी तत्वों को साबित करने में अभियोजन पक्ष की विफलता पर आधारित है।"
कोर्ट राज्य सरकार द्वारा 23 सितंबर, 2019 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था। उस फैसले में कैथल के सेशन जज ने धर्मपाल, जसबीर, शिव कुमार उर्फ बाबर और बलबीर को भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 124-A (देशद्रोह), 188, 427, 436, 450 और 120-B (धारा 34 के साथ) और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से रोकथाम अधिनियम, 1984 की धारा 3 और 4 के तहत अपराधों से बरी कर दिया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 25 अगस्त, 2017 को लाठी, डंडे, गंडासे और पेट्रोल की बोतलें लिए हुए 14-15 लोगों का एक समूह गुरमीत राम रहीम सिंह के समर्थन में नारे लगाते हुए कलायत में UHBVN ऑफिस की ओर बढ़ा। आरोप था कि अपनी सुरक्षा के डर से अधिकारी वहां से भाग गए, जिसके बाद हमलावरों ने ऑफिस का सामान तोड़-फोड़ दिया और इमारत में आग लगा दी।
जांच के दौरान, पुलिस ने चार मोटरसाइकिलें ज़ब्त कीं और दावा किया कि आरोपियों की निशानदेही पर पेट्रोल की बोतलें और हथियार बरामद किए गए। जांच पूरी होने के बाद मामला ट्रायल के लिए आगे बढ़ा, जहां अभियोजन पक्ष ने 30 गवाहों से पूछताछ की और दस्तावेज़ी व फोरेंसिक सबूत पेश किए। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया, जिसके बाद राज्य सरकार ने यह अपील दायर की।
हाईकोर्ट के सामने राज्य ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने ठोस मौखिक और दस्तावेज़ी सबूतों को गलत तरीके से समझा और छोटी-मोटी कमियों को बहुत ज़्यादा तूल देकर ज़रूरत से ज़्यादा तकनीकी नज़रिया अपनाया, जबकि अभियोजन पक्ष ने चश्मदीदों के बयान और बरामदगी के ज़रिए आरोपियों की संलिप्तता साबित कर दी थी।
Title: State of Haryana v. DHARAMPAL AND OTHERS