धारा 372 CrPC | सज़ा बढ़ाने के लिए पीड़ित की अपील सुनवाई योग्य नहीं: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल सज़ा को अपर्याप्त बताकर पीड़ित आपराधिक अपील दायर नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि धारा 372 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत पीड़ित को अपील का अधिकार केवल तीन सीमित परिस्थितियों में ही प्राप्त है—
(i) अभियुक्त के बरी होने पर,
(ii) कम गंभीर अपराध में दोषसिद्धि होने पर, या
(iii) अपर्याप्त प्रतिकर (compensation) दिए जाने पर।
जस्टिस आलोक कुमार पांडेय की एकल पीठ पीड़िता द्वारा दायर उस आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-VI सह विशेष न्यायाधीश (POCSO), पटना द्वारा पारित दोषसिद्धि एवं सज़ा के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामले के तथ्य
ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त (प्रतिवादी संख्या 2) को धारा 363 IPC (अपहरण) के तहत दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के कठोर कारावास और ₹5,000 जुर्माने की सज़ा सुनाई थी, जबकि उसे POCSO अधिनियम के आरोपों से बरी कर दिया गया था।
अभियोजन के अनुसार, पीड़िता (लगभग 15 वर्ष की) 19 जनवरी 2022 को सुबह करीब 9 बजे कोचिंग के लिए घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। आरोप था कि अभियुक्त उसे उस घर से ले गया, जहाँ वह पिछले दो वर्षों से रह रही थी।
ट्रायल के दौरान, पीड़िता और उसके माता-पिता ने यह भी आरोप लगाया कि अभियुक्त ने उसे नशीला पदार्थ दिया और उसके साथ यौन दुराचार व हमला किया।
पीड़िता की दलील
पीड़िता ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर धारा 363 IPC के तहत सज़ा बढ़ाने और अभियुक्त को धारा 12 POCSO अधिनियम (यौन उत्पीड़न) के तहत दोषी ठहराने की मांग की।
उसका कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 363 IPC के तहत अधिकतम सज़ा न देकर त्रुटि की है।
अभियुक्त की दलील
अभियुक्त ने तर्क दिया कि नशा देने और यौन हमले से संबंधित पीड़िता के आरोप, धारा 164 CrPC के तहत दिए गए उसके पूर्व बयान से मेल नहीं खाते और ये बाद में जोड़े गए तथ्य (material improvement) हैं, जो जांच अधिकारी के बयान से भी असंगत हैं।
हाईकोर्ट के अवलोकन
हाईकोर्ट ने कहा कि चिकित्सकीय साक्ष्य से स्पष्ट है कि कोई यौन अपराध नहीं हुआ, और इसलिए POCSO अधिनियम के तहत बरी किए जाने में हस्तक्षेप से इनकार किया।
हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि यह सिद्ध है कि नाबालिग पीड़िता को उसके वैध अभिभावकों की सहमति के बिना अभियुक्त द्वारा ले जाया गया, इसलिए धारा 363 IPC के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।
कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि पीड़िता के अपहरण का मूल तथ्य तो प्रमाणित है, लेकिन नशा, यौन दुराचार, धमकी, अवैध निरुद्धीकरण और बरामदगी से जुड़े आरोप बाद की कल्पना (afterthought) प्रतीत होते हैं, जिन्हें समकालीन बयानों का समर्थन नहीं मिलता और जो जांच अधिकारी की गवाही से भी खंडित होते हैं।
सज़ा बढ़ाने पर कानून की स्थिति
सज़ा बढ़ाने के प्रश्न पर, हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 372 CrPC पीड़ित को केवल सीमित परिस्थितियों में अपील का अधिकार देती है और केवल सज़ा को अपर्याप्त बताकर अपील का कोई स्वतंत्र अधिकार प्रदान नहीं करती।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले National Commission for Women v. State of Delhi & Another पर भरोसा करते हुए अदालत ने कहा कि केवल अपर्याप्त सज़ा के आधार पर पीड़ित की अपील विचारणीय नहीं है।
अदालत ने कहा:
“धारा 372 CrPC के प्रावधान से स्पष्ट है कि पीड़ित का अपील का अधिकार केवल तीन स्थितियों तक सीमित है—अभियुक्त का बरी होना, कम गंभीर अपराध में दोषसिद्धि या अपर्याप्त प्रतिकर।
सज़ा को अपर्याप्त बताकर अपील करने का अधिकार केवल राज्य सरकार को धारा 377 CrPC के तहत प्राप्त है, न कि पीड़ित को।”
निर्णय
इन कारणों से, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश और सज़ा को बरकरार रखा और अपील को प्रवेश स्तर पर ही खारिज कर दिया।