साथ रहने या सार्थक संपर्क के बिना ससुराल पक्ष पर क्रूरता के आरोप स्वभावतः अविश्वसनीय: पटना हाइकोर्ट
पटना हाइकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पति के रिश्तेदारों के साथ न तो साझा निवास हो और न ही कोई सार्थक संपर्क, तो ससुराल पक्ष के खिलाफ क्रूरता के आरोप अपने आप में अविश्वसनीय हो जाते हैं। हाइकोर्ट ने इस आधार पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
यह मामला भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धाराओं 85, 115(2), 118(1) और 191(2) के तहत दर्ज एक शिकायत से जुड़ा था। ट्रायल कोर्ट द्वारा संज्ञान लिए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए पति के रिश्तेदारों ने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मामले की सुनवाई जस्टिस रुद्र प्रकाश मिश्रा की एकल पीठ ने की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि पति के रिश्तेदारों ने विवाहिता के साथ क्रूरता की, जिसमें जातिसूचक गाली-गलौज और मारपीट जैसे आरोप शामिल थे।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है और इसे प्रारंभिक स्तर पर ही रद्द किया जाना चाहिए। यह भी कहा गया कि शिकायत में केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए गए हैं, जिनमें किसी भी याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई विशिष्ट कृत्य या ठोस भूमिका नहीं बताई गई।
हाइकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और व्यापक प्रकृति के हैं। शिकायत में उत्पीड़न की एक सामान्य कहानी के अलावा, किसी भी आरोपी के खिलाफ कोई स्पष्ट और ठोस आरोप नहीं लगाया गया।
कोर्ट ने विशेष रूप से इस तथ्य पर जोर दिया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया कि वह पिछले करीब तीन वर्षों से याचिकाकर्ताओं से अलग रह रही थी और कभी उनके साथ एक ही घर में नहीं रही। हाइकोर्ट ने कहा कि यह स्वीकारोक्ति क्रूरता के आरोप की जड़ पर प्रहार करती है।
हाइकोर्ट ने टिप्पणी की कि वैवाहिक मामलों में क्रूरता का अर्थ कुछ हद तक निकटता, आपसी संपर्क या सहवास से जुड़ा होता है, जिससे उत्पीड़न या दुर्व्यवहार संभव हो सके। जब न तो साझा निवास हो और न ही कोई सार्थक संपर्क, तब ससुराल पक्ष द्वारा क्रूरता का आरोप स्वभावतः अविश्वसनीय हो जाता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि BNS की धारा 85 के तहत अपराध के लिए दो आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है वैध वैवाहिक संबंध और उस संबंध से उत्पन्न क्रूरता। वर्तमान मामले में कोर्ट ने पाया कि ये दोनों तत्व सिद्ध नहीं होते।
इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए पटना हाइकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित संज्ञान का आदेश रद्द कर दिया।