तलाक और बच्चों की अभिरक्षा के कागजात पर हस्ताक्षर का दबाव बनाना अपने आप में क्रूरता नहीं: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद के दौरान पति या पत्नी पर तलाक और बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाना मात्र से भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 के तहत क्रूरता का अपराध नहीं बनता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा आचरण न तो संपत्ति या मूल्यवान वस्तु की अवैध मांग के लिए उत्पीड़न की श्रेणी में आता है और न ही ऐसा जानबूझकर किया गया व्यवहार है, जिससे महिला आत्महत्या करने या गंभीर शारीरिक अथवा मानसिक क्षति झेलने के लिए विवश हो जाए।
जस्टिस प्रवीण कुमार की एकल पीठ ने पति के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करते हुए कहा कि यदि एफआईआर में लगाए गए सभी आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तब भी उनसे आरोपित अपराध नहीं बनते।
मामले में पत्नी ने FIR दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि वर्ष 2010 में विवाह के बाद से उसे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उसने दिल्ली में पहले दर्ज कराई गई शिकायतों, दोनों पक्षों के बीच लंबित मामलों, अपने माता-पिता के साथ मारपीट, वर्ष 2019 में देवरों के कथित अनुचित व्यवहार और सीसीटीवी फुटेज का भी उल्लेख किया था।
वर्तमान मामले में पत्नी का आरोप है कि पति ने समझौते के बहाने उसे पटना के होटल मौर्य बुलाया और वहां तलाक तथा दोनों बेटियों की अभिरक्षा से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए लगातार दबाव बनाया। मना करने पर उसके साथ मारपीट की गई और पति के भाई ने उसके परिवार को धमकी दी। पत्नी ने कहा कि वह डर के कारण होटल के कमरे में खुद को बंद कर बैठ गई और अगले दिन अपने पिता तथा पुलिस के साथ वहां से निकली।
पति की ओर से कहा गया कि यह FIR प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई गई। उन्होंने बताया कि सितंबर 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट के मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ, जिसके बाद एक-दूसरे के खिलाफ लंबित मामले वापस ले लिए गए।
हाईकोर्ट ने कहा कि समझौते से पहले के सभी विवाद समाप्त हो चुके थे और वर्तमान FIR मुख्य रूप से 7 जनवरी 2026 को होटल मौर्य में हुई एक घटना पर आधारित है।
अदालत ने कहा,
"पत्नी का मूल आरोप यह है कि उस पर अलगाव की शर्तें स्वीकार करने का दबाव बनाया गया। यह वैवाहिक बातचीत का हिस्सा था, भले ही वह बेहद कटु रही हो।"
पीठ ने कहा कि तलाक और बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने की मांग को BNS की धारा 86 के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा,
"तलाक की याचिका और बच्चों की अभिरक्षा संबंधी व्यवस्था पर हस्ताक्षर करने की मांग न तो संपत्ति की मांग है और न ही किसी मूल्यवान वस्तु की। साथ ही FIR में वर्णित एकमात्र घटना धारा 86 के दूसरे पहलू को भी पूरा नहीं करती।"
हाईकोर्ट ने अवैध रूप से बंधक बनाने के आरोप को भी स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि पत्नी ने अपनी शुरुआती शिकायत में स्वयं कहा कि उसने डर के कारण कमरे को अंदर से बंद कर लिया था और अगले दिन पिता व पुलिस के आने पर बाहर निकली। बाद में उसने शपथपत्र में दावा किया कि उसे बंधक बनाकर रखा गया और वह किसी तरह वहां से निकली। अदालत ने कहा कि दोनों बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि सितंबर 2025 में दोनों पक्ष समझौता कर चुके थे और पुराने मुकदमे वापस ले लिए गए। बाद में दोनों के बीच फिर विवाद उत्पन्न हुआ और पत्नी ने स्वयं भी विवाह विच्छेद के लिए वैवाहिक वाद दायर किया।
इन सभी तथ्यों पर विचार करते हुए पटना हाईकोर्ट ने कहा कि FIR के सभी आरोपों को सही मान लेने पर भी आरोपित अपराध नहीं बनते। इसी आधार पर अदालत ने पति के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की।