सात बैच गुणवत्ता जांच में फेल, ORS आपूर्तिकर्ता को ब्लैक लिस्ट में डालने का फैसला बरकरार: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने सात बैच गुणवत्ता जांच में असफल पाए जाने के बाद एक ORS (ओरल रिहाइड्रेशन साल्ट) आपूर्तिकर्ता को दो वर्ष के लिए ब्लैक लिस्ट में डालने के फैसले को सही ठहराया।
अदालत ने कहा कि सार्वजनिक वितरण के लिए दवाओं की खरीद में संबंधित एजेंसी की यह विशेष जिम्मेदारी है कि लाभार्थियों तक केवल निर्धारित गुणवत्ता वाली दवाएं ही पहुंचें।
एक्टिंग चीफ जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस राजेश कुमार वर्मा की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि जब अनुबंध में तय गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया का पालन किया गया, तब हाईकोर्ट न्यायिक समीक्षा के दौरान तकनीकी विशेषज्ञों की राय के स्थान पर अपनी राय नहीं दे सकता।
मामला बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड (BMSICL) की वर्ष 2023 की निविदा से जुड़ा था। याचिकाकर्ता को ORS की आपूर्ति का ठेका मिला था और उसके बाद खरीद आदेश जारी किए गए।
अनुबंध के दौरान आपूर्ति किए गए ORS के कुछ नमूनों की BMSICL से संबद्ध लैब में जांच कराई गई। जांच में सात बैच निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप नहीं पाए गए।
इसके बाद दो कारण बताओ नोटिस जारी किए गए और दोबारा जांच के बाद BMSICL ने संबंधित उत्पाद को दो वर्ष के लिए काली सूची में डालते हुए सभी लंबित खरीद आदेश रद्द कर दिए।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि कारण बताओ नोटिस में ब्लैक लिस्ट में डालने का प्रस्ताव नहीं था इसलिए उसे इस दंड के संबंध में अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिला।
वहीं BMSICL ने कहा कि पूरी कार्रवाई निविदा की शर्तों के अनुरूप और पर्याप्त अवसर देने के बाद की गई। निगम ने यह भी बताया कि ORS के लिए सील परीक्षण बेहद महत्वपूर्ण गुणवत्ता मानक है, क्योंकि पैकिंग खराब होने पर नमी, संक्रमण और दवा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा पैदा होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने स्वेच्छा से निविदा प्रक्रिया में भाग लिया था, मानक निविदा दस्तावेज स्वीकार किए और अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। इसलिए वह गुणवत्ता जांच और उसके परिणामों से जुड़ी सभी शर्तों का पालन करने के लिए बाध्य था।
अदालत ने यह भी कहा कि पहली प्रतिकूल रिपोर्ट के बाद तुरंत कार्रवाई नहीं की गई बल्कि दोबारा जांच कराई गई और दूसरी बार भी बैच मानकों पर खरे नहीं उतरने के बाद दूसरा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
दोनों नोटिसों के जवाब पर विचार करने के बाद ही अंतिम आदेश पारित किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा,
"सार्वजनिक वितरण के लिए दवाओं की खरीद के मामलों में खरीद एजेंसी पर यह विशेष दायित्व होता है कि लाभार्थियों तक केवल निर्धारित गुणवत्ता वाली दवाएं ही पहुंचें।"
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मानक निविदा दस्तावेज के अनुसार यदि किसी उत्पाद के तीन बैच भी गुणवत्ता मानकों पर विफल हो जाते हैं तो उसे काली सूची में डाला जा सकता है। इस मामले में सात बैच जांच में असफल पाए गए।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि कार्रवाई मनमानी नहीं थी, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन भी नहीं हुआ। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।