S.53A CrPC | पटना हाईकोर्ट ने यौन अपराध के मामलों में आरोपी का मेडिकल जांच करने के लिए पुलिस को संवेदनशील बनाने को कहा
पटना हाइकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 53ए को भूला हुआ प्रावधान बताते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि पुलिस को संवेदनशील बनाया जाए ताकि यौन अपराध के मामलों में आरोपी की गिरफ्तारी के तुरंत बाद उसका मेडिकल टेस्ट कराया जाए। कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसा न होने पर जांच में गंभीर और अपूरणीय खामियां रह जाती हैं।
जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस अंसुल की खंडपीठ IPC की धारा 376 और POCSO Act की धारा 6 के तहत आजीवन कारावास से दंडित आरोपी की आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रही थी।
अभियोजन के अनुसार वर्ष 2016 में पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज बयान में आरोप लगाया गया कि लगभग 13 वर्ष की पीड़िता सुल्तानगंज में गुद्दन जी के घर रह रही थी। आरोप है कि FIR दर्ज होने से करीब पांच महीने पहले आरोपी मोहम्मद पप्पू पीड़िता को मोटरसाइकिल से दरभंगा ले गया, जहां उसने जबरन शारीरिक संबंध बनाए और अगली सुबह उसे वापस छोड़ दिया।
FIR से लगभग एक महीने पहले पीड़िता में शारीरिक परिवर्तन दिखाई दिए और बयान दर्ज कराते समय पीड़िता ने खुद को गर्भवती बताते हुए आरोपी का नाम लिया।
अपीलकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि पीड़िता का एक नाई, छोटू ठाकुर, के साथ अवैध संबंध था। कहा गया कि इसी बात को लेकर आरोपी और छोटू ठाकुर के बीच विवाद हुआ था। इसके बाद निजी रंजिश के चलते पीड़िता और उसके पिता ने मिलकर आरोपी को झूठे मामले में फंसा दिया।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि FIR में छोटू ठाकुर का नाम दर्ज था लेकिन बाद में वह क्षेत्र से फरार हो गया और उसकी दुकान बंद पाई गई। यह भी तर्क दिया गया कि ट्रायल के दौरान पीड़िता और उसके पिता ने अपने पहले के बयानों से पलटते हुए छोटू ठाकुर को आरोपी ठहराने से इनकार कर दिया और केवल अपीलकर्ता पर आरोप लगाया।
हाइकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 का हवाला देते हुए कहा कि कम उम्र के बाल गवाह की गवाही से पहले यह सुनिश्चित करना ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य है कि गवाह प्रश्नों को समझने और तर्कसंगत उत्तर देने में सक्षम है या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि गवाही में यह स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए कि ट्रायल जज ने बाल गवाह की मानसिक क्षमता, समझ और विवेक की जांच के लिए कौन से प्रश्न पूछे। मौजूदा मामले में स्पेशल जज द्वारा ऐसा कोई प्रारंभिक परीक्षण दर्ज नहीं किया गया।
कोर्ट ने यह भी पाया कि FIR और CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज पीड़िता के बयान में गंभीर विरोधाभास हैं। इन विसंगतियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि यह मानने का आधार है कि पीड़िता और उसके पिता एक स्पष्ट और सुसंगत कहानी के साथ अदालत के समक्ष नहीं आए ऐसे में उनकी गवाही पर सुरक्षित रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता।
आरोपी की मेडिकल जांच के मुद्दे पर हाइकोर्ट ने दोहराया कि यौन अपराध के मामलों में आरोपी की मेडिकल जांच CrPC की धारा 53ए के तहत अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि DNA प्रोफाइलिंग जैसे वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने के लिए आरोपी से नमूने एकत्र करना मेडिकल अधिकारी का वैधानिक दायित्व है।
पीठ ने विशेष रूप से दर्ज किया कि इस मामले में आरोपी की गिरफ्तारी के बावजूद धारा 53ए के तहत उसकी मेडिकल जांच नहीं कराई गई।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि धारा 53ए बिहार राज्य में एक भूला हुआ प्रावधान बन चुकी है। इस न्यायालय ने अनेक आपराधिक अपीलों में पाया कि एक भी मामले में जांच अधिकारी ने इस प्रावधान का सहारा नहीं लिया।”
इस प्रावधान के महत्व को समझाते हुए कोर्ट ने उदाहरण दिया कि यदि किसी यौन अपराध के मामले में आरोपी की मेडिकल जांच नहीं कराई जाती और ट्रायल के दौरान वह नपुंसकता का दावा करता है तो धारा 53ए की रिपोर्ट के अभाव में अदालत के पास उस दलील को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
कोर्ट ने कहा कि अपील के स्तर पर नई मेडिकल जांच का आदेश देना साक्ष्य जुटाने जैसा होगा, जो उचित नहीं है। इसलिए पुलिस को निर्देशित किया जाना चाहिए कि आरोपी की गिरफ्तारी के तुरंत बाद उसकी मेडिकल जांच कराई जाए।
हाइकोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी को FIR दर्ज होने वाले दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया, फिर भी उसकी मेडिकल जांच न कराने का कोई कारण रिकॉर्ड पर नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि कम से कम यह साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र मेडिकल या वैज्ञानिक साक्ष्य रिकॉर्ड पर होना चाहिए था कि आरोपी कथित अपराध करने में सक्षम था।
इसके अलावा कोर्ट ने अभियोजन के मामले में कई गंभीर खामियों की ओर इशारा किया। न तो पीड़िता और न ही उसके पिता ने यह बताया कि दरभंगा की कथित घटना किस तारीख या समय पर हुई। जांच अधिकारी ने कथित घटनास्थल का निरीक्षण नहीं किया। पीड़िता के लगभग पांच महीने की गर्भवती होने के बावजूद अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि घटना कब, कहां और किसके द्वारा हुई। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि पहले नामजद किए गए छोटू ठाकुर को बाद में कैसे आरोपमुक्त कर दिया गया।
इन सभी कमियों को देखते हुए पटना हाइकोर्ट ने कहा कि POCSO Act के तहत अपराध स्थापित करने के लिए आवश्यक बुनियादी तथ्यों को अभियोजन साबित करने में असफल रहा है।
अंततः कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी के खिलाफ पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया।