मेघालय हाईकोर्ट ने गुरुवार (8 अक्टूबर) को मेघालय हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और शिलांग बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों और कार्यकारी सदस्यों को अवमानना नोटिस जारी किया। इन एसोसिएशन ने राज्य भर की सभी अदालतों में न्यायिक कामकाज से दूर रहने का आह्वान किया था, जब तक कि मेघालय सरकार एडवोकेट जनरल को हटा नहीं देती। कोर्ट ने कहा कि इस तरह काम से दूर रहने से न्याय प्रशासन में बाधा आती है और यह आपराधिक अवमानना ​​के बराबर है।

चीफ जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस एच.एस. थांगखियू की डिवीजन बेंच ने स्वतः संज्ञान लेते हुए याचिका दर्ज की। यह कदम तब उठाया गया जब दोनों बार एसोसिएशन ने 30 सितंबर के एक प्रस्ताव के ज़रिए 1 अक्टूबर से तब तक न्यायिक कामकाज से दूर रहने का आह्वान किया, जब तक एडवोकेट जनरल को उनके पद से नहीं हटा दिया जाता।

रजिस्ट्री ने कोर्ट के सामने ऐसे आंकड़े पेश किए, जिनसे पता चला कि काम से दूर रहने के कारण राज्य भर में न्यायिक कामकाज और न्याय प्रशासन प्रभावित हुआ, सिवाय बागमारा जिले के। कोर्ट ने गौर किया कि बागमारा बार एसोसिएशन ने इस आह्वान का समर्थन करने से इनकार किया था, क्योंकि ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के 'एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ' मामले में दिए गए फैसले के खिलाफ होता। कोर्ट ने कानून का पालन करने के एसोसिएशन के फैसले की सराहना की।

'एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल' मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि वकीलों को हड़ताल पर जाने (टोकन हड़ताल सहित) या हड़ताल का आह्वान करने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि एक वकील कोर्ट का अधिकारी होता है और उसका कर्तव्य है कि वह कोर्ट के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करे, जबकि हड़तालें न्याय प्रशासन में बाधा डालती हैं और मुकदमेबाजी करने वालों के हितों को खतरे में डालती हैं।

कोर्ट ने 'कृष्णकांत ताम्रकार बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले का भी हवाला दिया और कहा कि वकीलों की गैर-जरूरी हड़तालें न्याय प्रशासन में देरी के कारणों में से एक हैं और ऐसी हड़तालें, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानून के खिलाफ हैं, अवमानना ​​के बराबर हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी हड़ताल का आह्वान करने वाले पदाधिकारी अवमानना ​​के लिए अपनी जिम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकते। 'कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया और अन्य' मामले का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि काम से दूर रहना—चाहे उसे बॉयकॉट, विरोध या टोकन हड़ताल कहा जाए—असल में हड़ताल ही है और यह गैर-कानूनी है।

बता दें, कोर्ट ने कहा कि काम से दूर रहने के लिए जो वजह बताई गई—यानी राज्य सरकार द्वारा एडवोकेट जनरल को हटाए जाने तक न्यायिक कामकाज से दूर रहना—वह "पूरी तरह से अस्वीकार्य" है। कोर्ट ने कहा कि वकील एडवोकेट जनरल को हटाने का मकसद पूरा करने के लिए अदालतों का इस्तेमाल नहीं कर सकते और इस तरह काम से दूर रहना "अनुचित" है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

इसके बाद कोर्ट ने 'कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट, 1971' की धारा 15 और संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत दोनों बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों और कार्यकारी सदस्यों को नोटिस जारी किए। उनसे पूछा गया कि काम से दूर रहने का आह्वान करने और न्याय प्रशासन में बाधा डालने के लिए उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।

इस मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को तय की गई और सभी संबंधित लोगों (जिन पर अवमानना ​​का आरोप है) को कोर्ट के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया गया।

कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर दूसरे ज़िलों के वकीलों ने तुरंत न्यायिक कामकाज फिर से शुरू नहीं किया तो वह संबंधित ज़िला बार एसोसिएशनों (बाघमारा बार एसोसिएशन को छोड़कर) के अध्यक्षों, सचिवों और पदाधिकारियों के खिलाफ अवमानना ​​नोटिस जारी करने पर विचार करेगा।

कोर्ट ने 'बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया' को भी प्रतिवादी बनाया और 'मेघालय स्टेट बार काउंसिल' तथा 'बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया' को नोटिस जारी किए। कोर्ट ने 'मेघालय स्टेट बार काउंसिल' के चेयरमैन को 13 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने और काम से दूर रहने का आह्वान करने वाले वकीलों के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में कोर्ट को जानकारी देने का निर्देश दिया।

Case Title : Registrar General, High Court of Meghalaya v. State of Meghalaya & Ors

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