मेघालय हाईकोर्ट ने असम राइफल्स के एक पूर्व राइफलमैन द्वारा दायर पेंशन दावा खारिज किया, जिसे 13 साल से अधिक की सेवा प्रदान करने के बाद अपने अनुरोध पर सेवा से यह मानते हुए मुक्त कर दिया गया था कि स्वैच्छिक इस्तीफा केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के नियम 26 (1) के तहत पिछली सेवा को जब्त कर लेता है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई कर्मचारी नियम 49(2) का उपयोग नहीं कर सकता, जो 10 साल की अर्हक सेवा पूरी होने के बाद पेंशन लाभ प्रदान करता है, जबकि नियम 26(1) ऐसे लाभों पर रोक लगाता है।

अदालत ने देरी और लापरवाही के आधार पर याचिकाकर्ता की चुनौती को भी खारिज किया, क्योंकि उसने अपनी रिहाई के लगभग 22 साल बाद अधिकारियों से संपर्क किया।

कोर्ट ने कहा,

"स्वेच्छा से किसी पद से इस्तीफा देने पर पिछली सभी सेवाएं जब्त हो जाएंगी, इसलिए वह पेंशन लाभ का हकदार नहीं है। नियम 26(1) को नियम 49(2) के साथ रखा गया, यह स्पष्ट है कि चूंकि नियम 26(1) भविष्य के सेवा लाभों के लिए एक बाधा के रूप में कार्य करता है। इसलिए ऐसे परिदृश्य में नियम 49(2) अनुपयुक्त हो जाएगा।"

याचिकाकर्ता एल. पर्लसन को 3 जनवरी, 1986 को असम राइफल्स में राइफलमैन (जनरल ड्यूटी) के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें स्वेच्छा से छुट्टी की मांग किए बिना 30 जून, 1999 को सेवा से बर्खास्त किया गया, उनका आरोप था कि उनके हस्ताक्षर पहले से टाइप किए गए दस्तावेज़ पर प्राप्त किए गए।

हालांकि, उत्तरदाताओं ने तर्क दिया कि उन्होंने अपनी पत्नी की बीमारी के कारण अत्यधिक अनुकंपा के आधार पर 1998 में समय से पहले छुट्टी की मांग की थी और स्वीकार किया कि वह पेंशन लाभ के हकदार नहीं होंगे। 5 नवंबर, 2021 को अधिकारियों द्वारा पेंशन के लिए उनके अनुरोध को खारिज किए जाने के बाद उन्होंने फैसले को चुनौती देते हुए मेघालय हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मेघालय हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के डिस्चार्ज प्रमाणपत्र और 23 दिसंबर, 1998 के एक प्रमाणपत्र से यह स्थापित होता है कि उसने अनुकंपा के आधार पर डिस्चार्ज की मांग की थी और उसे पता था कि वह पेंशन लाभ का हकदार नहीं होगा। अदालत ने आगे कहा कि उन्होंने देरी के लिए कोई प्रशंसनीय स्पष्टीकरण दिए बिना छुट्टी के लगभग 22 साल बाद, केवल 2021 में अपनी छुट्टी को चुनौती दी।

पेंशन के सवाल पर न्यायालय ने माना कि किसी के स्वयं के अनुरोध पर स्वैच्छिक सेवामुक्ति को सीसीएस (पेंशन) नियम, 1972 के नियम 26(1) के तहत इस्तीफा माना जा सकता है, जिसमें पिछली सेवा को जब्त करना शामिल है। इसने स्पष्ट किया कि नियम 49(2), जो 10 साल की अर्हक सेवा पूरी होने के बाद पेंशन प्रदान करता है, वहां लागू नहीं होगा जहां नियम 26(1) एक बाधा के रूप में कार्य करता है।

तदनुसार, अदालत ने अधिकारियों को याचिकाकर्ता के आईआरएलए खाते में ₹5,656 और उसके जीपीएफ खाते में ₹53,642, यदि पहले से भुगतान नहीं किया गया, 30 दिनों के भीतर जारी करने का निर्देश देते हुए याचिका खारिज की।

Case Title : L.Pearlson v/s Union of India

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