मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती मंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित रूप से झूठी जानकारी फैलाने के मामले में विनोद सूर्या कुमार के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी।

जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने कहा कि किसी मंत्री के खिलाफ झूठी जानकारी या अफवाह फैलाना तभी संबंधित आपराधिक प्रावधानों के तहत अपराध बनेगा, जब उसे फैलाने का इरादा या संभावित प्रभाव जनता में डर या घबराहट पैदा करना हो।

क्या था मामला?

कुमार ने सोशल मीडिया पोस्ट में मंत्री को पलानी स्थित अरुल्मिगु दंडायुधपाणि स्वामी मंदिर की जमीन के कथित फर्जी पंजीकरण से जोड़ा था। शिकायत के आधार पर साइबर पुलिस ने उनके खिलाफ BNS की धारा 192, 353(1)(b) और 353(2) के तहत मामला दर्ज किया था।

कुमार ने दलील दी कि पोस्ट राजनीतिक टिप्पणियों का हिस्सा थीं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती हैं।

हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 192 के लिए दंगा भड़काने की मंशा का कोई प्रमाण नहीं था और न ही कोई दंगा हुआ। वहीं धारा 353 लागू करने के लिए धर्म, जाति, भाषा या समुदाय आदि के आधार पर दुश्मनी या वैमनस्य पैदा करने की मंशा जरूरी है, जो इस मामले में नहीं मिली।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि पोस्ट में मंत्री के खिलाफ मानहानिकारक आरोप जरूर लगाए गए थे।

कोर्ट ने कुमार को अपनी गलती स्वीकार करते हुए हलफनामा दाखिल कर माफी मांगने को कहा और मंत्री को मानहानि के लिए सिविल या आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की स्वतंत्रता दी।

अंततः कोर्ट ने संबंधित FIR और उसके आधार पर चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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