मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि पति का किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध होना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत पत्नी के साथ क्रूरता का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

जस्टिस सुंदर मोहन ने इस आधार पर पत्नी और उनकी डेढ़ साल की बच्ची की आत्महत्या के मामले में पति को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। पति पर क्रूरता और दहेज उत्पीड़न से संबंधित आरोप लगाए गए थे।

अदालत ने कहा,

“इस मामले में भी यह साबित हुआ है कि दूसरे प्रतिवादी का अवैध संबंध था। तथ्यों के आधार पर अदालत की राय है कि यह संबंध इस प्रकृति का नहीं था, जिससे पत्नी आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाए। यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि IPC की धारा 498ए के तहत अपराध साबित करने के लिए केवल अवैध संबंध से कुछ अधिक साबित करना आवश्यक है जो इस मामले में नहीं हुआ।”

हाईकोर्ट पत्नी के भाई की ओर से दायर उस अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें पति को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई।

अभियोजन पक्ष के अनुसार पति-पत्नी की शादी सितंबर 2008 में हुई। आरोप था कि पति दहेज की मांग को लेकर पत्नी को प्रताड़ित करता था, उसका किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध था और वह पत्नी तथा बच्चे की उचित देखभाल भी नहीं करता था।

अभियोजन ने बताया कि पत्नी ने अपनी डेढ़ साल की बच्ची के साथ पानी में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस आधार पर पति के खिलाफ IPC की धारा 498ए और धारा 306 के तहत अपराध का आरोप लगाया गया। धारा 306 आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित है।

ट्रायल कोर्ट ने पति को बरी करते हुए कहा था कि अभियोजन पक्ष दहेज की मांग साबित नहीं कर सका। इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113ए के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने की धारणा लागू नहीं की जा सकती। ट्रायल कोर्ट ने यह भी पाया कि ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य नहीं था जिससे साबित हो कि पति ने पत्नी के साथ ऐसी क्रूरता की थी जिसके कारण उसने आत्महत्या की।

अपील में पत्नी के भाई ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने दहेज की मांग और पति के कथित अवैध संबंध के संबंध में उसकी, उसकी मां और अन्य गवाहों की गवाही को नजरअंदाज कर दिया। उसने कहा कि मां ने स्पष्ट रूप से बयान दिया कि उसकी बेटी को प्रताड़ित किया जाता था। अपीलकर्ता के अनुसार साक्ष्यों पर उचित विचार किए बिना ट्रायल कोर्ट द्वारा निकाला गया निष्कर्ष गलत था और उसे रद्द किया जाना चाहिए।

वहीं, पति की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन पक्ष न तो दहेज की मांग साबित कर पाया और न ही यह स्थापित कर सका कि उसका किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध था।

हाईकोर्ट ने पाया कि कुछ गवाहों ने दहेज की कथित मांग का उल्लेख जरूर किया लेकिन उनके आरोप अस्पष्ट थे। इन बयानों से अधिकतम यही संकेत मिलता है कि पति-पत्नी के बीच विवाद का एक कारण पति का कथित विवाहेतर संबंध था।

अदालत ने यह भी गौर किया कि पत्नी के भाई ने शुरुआत में महिला के लापता होने के संबंध में जो शिकायत दर्ज कराई थी, उसमें दहेज की मांग का कोई उल्लेख नहीं है। हालांकि, उसने उस शुरुआती शिकायत में पति के कथित अवैध संबंध का जिक्र किया। हाईकोर्ट के अनुसार बाद में गवाहों ने दहेज की मांग के आरोप को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जबकि शुरुआती बयानों में ऐसा आरोप नहीं लगाया गया।

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष गलत था कि पति का अवैध संबंध साबित नहीं हुआ। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि अवैध संबंध साबित हो जाने मात्र से IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता का अपराध अपने आप स्थापित नहीं होता। इसके लिए अभियोजन पक्ष को अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं, जो इस मामले में नहीं किए गए।

सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पति को बरी करने के लिए दिए गए सभी कारण स्वीकार्य नहीं थे, लेकिन इसके बावजूद अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा था। इसलिए अदालत ने पत्नी के भाई की अपील खारिज की और पति को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: