बच्चा सामान्य जीवन नहीं जी सकेगा तो उसे जन्म देना है या नहीं, यह तय करने का अधिकार मां को: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने भ्रूण में गंभीर असामान्यताएं पाए जाने के बाद 28 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी। जस्टिस पी.टी. आशा ने कहा कि मां को यह निर्णय लेने का अधिकार है कि वह बच्चे को जन्म देना चाहती है या नहीं, खासकर तब, जब बच्चे के सामान्य जीवन जी पाने की संभावना प्रभावित हो सकती हो।
अदालत ने कहा,
“इस मामले में स्कैन रिपोर्ट स्पष्ट रूप से भ्रूण में गंभीर असामान्यताओं को दर्शाती हैं। मां को यह निर्णय लेने का अधिकार है कि वह ऐसे बच्चे को जन्म देना चाहती है या नहीं, खासकर तब जब बच्चा सामान्य जीवन नहीं जी पाएगा। इसलिए इस अदालत को याचिकाकर्ता मां के फैसले का सम्मान करना होगा। उसने बच्चे के सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन जीने की संभावनाओं से जुड़े गंभीर जोखिमों को ध्यान में रखते हुए यह कठिन और पीड़ादायक कदम उठाया है।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे बच्चे को दिन-प्रतिदिन होने वाली तकलीफ को उसके माता-पिता को ही देखना पड़ता है। अदालत ने साथ ही टिप्पणी की कि अजन्मे बच्चे को भी सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है और अदालत को इस बात पर भी विचार करना होगा कि माता-पिता के जीवित न रहने के बाद बच्चे का जीवन कैसा होगा।
अदालत ने कहा,
“माता-पिता को हर दिन यह देखना पड़ेगा कि ऐसे बच्चे को किन कठिनाइयों और पीड़ाओं से गुजरना होगा। उन्होंने यह निर्णय इसलिए लिया है, ताकि बच्चे को ऐसी जिंदगी जीने के लिए इस दुनिया में न लाया जाए, जिसमें उसे सम्मान से वंचित रहना पड़े। इसके अलावा, अजन्मे बच्चे को भी सम्मानजनक जीवन जीने और उपहास का पात्र न बनने का अधिकार है। इस अदालत को माता-पिता के जीवनकाल के बाद बच्चे के जीवन पर भी विचार करना होगा।”
हाईकोर्ट महिला की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने मेडिकल बोर्ड द्वारा गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देने से इनकार किए जाने को चुनौती दी थी। महिला की शादी दिसंबर 2022 में हुई और फरवरी 2024 में उसने एक बेटे को जन्म दिया। वर्ष 2026 की शुरुआत में वह दोबारा गर्भवती हुई और नियमित चिकित्सकीय उपचार करा रही थी। इसी दौरान गर्भावस्था की एक तिमाही में किए गए स्कैन में भ्रूण के मस्तिष्क के वेंट्रिकल्स के हल्के बढ़े हुए होने की स्थिति सामने आई, जिसे मेडिकल भाषा में वेंट्रिकुलोमेगाली कहा जाता है।
दूसरी चिकित्सकीय राय में भी इस स्थिति की पुष्टि हुई। इसके बाद दंपति ने गर्भावस्था समाप्त करने का निर्णय लिया। हालांकि, प्रसूति एवं स्त्री रोग संस्थान तथा सरकारी महिला एवं बाल अस्पताल के अध्यक्ष ने गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देने से इनकार किया और महिला को आनुवंशिक जांच कराने की सलाह दी। इसके बाद महिला ने राहत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत ने मेडिकल रिपोर्टों पर गौर करते हुए कहा कि वे स्पष्ट रूप से संकेत देती हैं कि भ्रूण के जन्म के समय उसमें असामान्यताएं हो सकती हैं। अदालत के मुताबिक, भ्रूण में पाई गई स्थिति के कारण विकास संबंधी कठिनाइयों का जोखिम बढ़ सकता है। इनमें बोलने और भाषा सीखने में देरी, पढ़ाई में कठिनाई, संज्ञानात्मक कार्यों में परेशानी, व्यवहार संबंधी समस्याएं, संवाद करने के कौशल में कमी, मिर्गी और बौद्धिक अक्षमता शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का उल्लेख करते हुए, जिनमें यह स्थापित किया गया कि महिला को गर्भावस्था जारी रखने या समाप्त करने के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है, हाईकोर्ट ने भ्रूण में असामान्यताएं होने की आशंका पर भी विचार किया। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देना उचित समझा।