किशोरावस्था में होने वाले हार्मोनल बदलाव होते हैं: मद्रास हाईकोर्ट ने POCSO मामले में उम्रकैद की सज़ा घटाकर 10 साल की
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि रोमांटिक रिश्तों से जुड़े मामलों में सज़ा तय करते समय किशोरावस्था में होने वाले हार्मोनल बदलावों का असर एक अहम बात हो सकती है, भले ही POCSO Act के तहत सहमति या रोमांटिक रिश्ता कोई बचाव का आधार न हो।
जस्टिस आनंद वेंकटेश और जस्टिस केके रामकृष्णन की बेंच ने दोषी की उम्रकैद की सज़ा को घटाकर 10 साल की कठोर कैद में बदल दिया; अपराध करते समय दोषी की उम्र मुश्किल से 19 साल थी।
कोर्ट ने कहा,
"आरोपी पीड़िता को लंबे समय से जानता था... आरोपी और पीड़िता के बीच रिश्ते को देखते हुए यह कोर्ट उस उम्र में होने वाले हार्मोनल बदलावों के बुरे असर को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। नतीजतन, ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सज़ा बहुत कठोर है और इसमें बदलाव की ज़रूरत है।"
कोर्ट अरुमुगम की आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसे श्रीविलीपुथुर के एडिशनल महिला और सेशन जज ने IPC की धारा 306 के साथ धारा 511, POCSO Act की धारा 5(l), 5(j)(ii) के साथ धारा 6 और SC/ST Act की धारा 3(3)(v) और 3(1)(w)(i) के तहत दोषी ठहराया और सज़ा सुनाई।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता अनुसूचित जाति समुदाय से थी और आरोपी उसे तब से जानता था जब वह 8वीं कक्षा में थी। जब पीड़िता 11वीं कक्षा में पढ़ रही थी तो आरोपी ने उसे प्रेम प्रस्ताव दिया। 2019 में आरोपी ने पीड़िता से फ़ोन पर संपर्क किया, उससे शादी करने का वादा किया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई।
जब पीड़िता ने आरोपी को बताया कि वह गर्भवती है तो आरोपी ने ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया और उससे शादी करने से मना कर दिया, यह कहते हुए कि वह अनुसूचित जाति समुदाय से है। बाद में जब पीड़िता गर्भावस्था के अंतिम चरण में थी, तो उसने फिर से आरोपी से संपर्क किया, लेकिन उसने शादी करने से इनकार कर दिया और उसे मरने के लिए कह दिया। इसके बाद पीड़िता ने ज़हर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की और उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसने एक बच्ची को जन्म दिया।
पीड़िता की माँ की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया। सुनवाई के बाद अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ने मामले को बिना किसी संदेह के साबित किया और आरोपी को दोषी ठहराते हुए सज़ा सुनाई।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र साबित करने में विफल रहा। अदालत ने यह भी गौर किया कि पीड़िता और आरोपी के बीच आपसी सहमति से रोमांटिक संबंध थे। इसमें कोई ज़बरदस्ती, धमकी या बल प्रयोग नहीं किया गया। यह तर्क दिया गया कि POCSO Act उन किशोरों को सज़ा देने के लिए नहीं है जिनके बीच सही समझ के साथ संबंध थे।
अदालत ने कहा कि हालांकि यह दलील आकर्षक और रोमांटिक लग सकती है, लेकिन POCSO Act में किसी ऐसे रोमांटिक संबंध या अपवाद की कोई गुंजाइश नहीं है, जहां किसी बच्चे का यौन शोषण हुआ हो। अदालत ने आगे कहा कि कानून की नज़र में 18 साल से कम उम्र का बच्चा सहमति देने में असमर्थ होता है और बच्चे के साथ आपसी सहमति से बने रोमांटिक संबंध के मामले में भी एक्ट के तहत दंडात्मक प्रावधान लागू होंगे।
अदालत ने कहा,
"बच्चे द्वारा सहमति देने का कोई सवाल ही नहीं उठता और POCSO Act के तहत ऐसी किसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की गई। अगर सहमति को आधार मानकर अदालत उस पर कार्रवाई करती है तो इसके बहुत गंभीर परिणाम होंगे और यह POCSO Act के मूल उद्देश्य के ही खिलाफ होगा। कानून की नज़र में 18 साल से कम उम्र का बच्चा सहमति देने में असमर्थ होता है, इसलिए बच्चे के साथ आपसी सहमति से बने रोमांटिक संबंध के मामले में भी एक्ट के प्रावधान लागू होंगे और संबंधित व्यक्ति को परिणाम भुगतने होंगे।"
इस मामले में अदालत ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष ने यह साबित करिया कि आरोपी ने पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट (penetrative sexual assault) किया, जिसके परिणामस्वरूप पीड़िता गर्भवती हुई और उसने एक बच्चे को जन्म दिया। अदालत ने यह भी गौर किया कि अभियोजन पक्ष ने स्कूल सर्टिफिकेट और स्कूल के हेडमास्टर के सबूतों के ज़रिए पीड़िता की उम्र साबित की।
हालांकि, अदालत ने कहा कि इस मामले में SC/ST Act के प्रावधान लागू नहीं होंगे, क्योंकि पीड़िता और आरोपी के बीच संबंध स्वाभाविक आकर्षण के कारण थे, न कि इसलिए कि वह अनुसूचित जाति समुदाय से थी।
इस प्रकार, अदालत ने अपराध के लिए आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा (SC/ST Act के तहत अपराधों को छोड़कर)। हालांकि, अदालत ने सज़ा को बदलकर 10 साल की कठोर क़ैद कर दिया।
Case Title: Arumugam v The Deputy Superintendent of Police and Another