विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की पहचान, भूख हड़ताल करना अपराध नहीं: मद्रास हाईकोर्ट ने किसान पर दर्ज मुकदमा किया रद्द
मद्रास हाईकोर्ट ने किसान संगठन के नेता के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों के विरोध में भूख हड़ताल करने वाले एक किसान के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमा रद्द करते हुए कहा कि विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की पहचान है और यह संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। केवल नारे लगाने या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने को अपराध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस एम. निर्मल कुमार ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि प्रदर्शन के कारण आम जनता को कोई असुविधा हुई या यातायात बाधित हुआ।
अदालत ने कहा,
"सिर्फ नारे लगाने और विरोध-प्रदर्शन करने से कोई अपराध नहीं बनता। विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की पहचान है और यह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है।"
मामला तिरुपुर जिले के पल्लादम न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित आपराधिक मुकदमे से जुड़ा था। याचिकाकर्ता कृष्णमूर्ति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने खिलाफ चल रही कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।
अभियोजन के अनुसार कृष्णमूर्ति और अन्य लोगों ने तमिलनाडु किसान संरक्षण संघ के संस्थापक एवं वकील एम. ईसन के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लेने की मांग को लेकर भूख हड़ताल और विरोध-प्रदर्शन किया। आरोप है कि यह प्रदर्शन बिना प्रशासन की अनुमति के किया गया, जिससे आम जनता को असुविधा हुई और आवागमन प्रभावित हुआ।
गांव प्रशासनिक अधिकारी की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आरोपपत्र दाखिल किया, जिसके बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट ने संज्ञान ले लिया।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उनका संगठन किसानों से जुड़े जनहित के मुद्दों पर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से काम करता है। संगठन के संस्थापक के खिलाफ लगातार दर्ज किए जा रहे मामलों के विरोध में सरकार और जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए शांतिपूर्ण भूख हड़ताल की गई। यह किसी गैरकानूनी गतिविधि का प्रयास नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असहमति की अभिव्यक्ति थी।
यह भी दलील दी गई कि प्रदर्शन किसी सार्वजनिक सड़क पर नहीं, बल्कि निजी भूमि पर हुआ। साथ ही, घटना वाले दिन किसी प्रकार का निषेधाज्ञा आदेश भी लागू नहीं था। इसलिए याचिकाकर्ता केवल संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार का प्रयोग कर रहे थे।
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि प्रदर्शन बिना अनुमति किया गया और इससे आम लोगों को असुविधा हुई। इसलिए मुकदमा रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि न तो किसी आम नागरिक ने शिकायत दर्ज कराई और न ही यह साबित हुआ कि प्रदर्शन से किसी को वास्तविक परेशानी हुई।
अदालत ने यह भी पाया कि घटना के दिन कोई निषेधाज्ञा लागू नहीं थी और याचिकाकर्ता द्वारा किसी आदेश की अवहेलना भी नहीं की गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता और अन्य लोगों ने केवल किसान संगठन के संस्थापक के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग करते हुए शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन किया, जो संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार है।
इन परिस्थितियों में अदालत ने कहा कि इस मामले में आपराधिक मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग होगा।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए किसान के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द की।