गिरफ्तार वकीलों को अदालत में पेश करने से पुलिस को नहीं रोक सकते वकील: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी वकील की गिरफ्तारी में पुलिस की ज्यादती का आरोप हो तो अन्य वकील उसके खिलाफ आपत्ति जता सकते हैं और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके से विरोध भी कर सकते हैं। लेकिन वे पुलिस को गिरफ्तार वकील को अदालत में पेश करने से नहीं रोक सकते।
जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने यह टिप्पणी 10 वकीलों की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमा रद्द करने की मांग की। उन पर आरोप था कि उन्होंने मादक पदार्थ मामले में गिरफ्तार दो वकीलों को अदालत में पेश करने से पुलिस को रोका।
अदालत ने कहा कि यदि पुलिस ने गिरफ्तारी के दौरान कोई ज्यादती की थी तो उसका वैधानिक तरीका यह था कि गिरफ्तार वकीलों को अदालत में पेश होने दिया जाता, वहां रिमांड का विरोध किया जाता और उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाए जाते।
अदालत ने कहा,
"यदि पुलिस ने वकीलों के साथ कोई ज्यादती की थी, तो उचित तरीका यह था कि उन्हें अदालत में पेश होने दिया जाता, वहां आपत्ति दर्ज कराई जाती, रिमांड स्वीकार न करने का अनुरोध किया जाता और कानून के अनुसार उपलब्ध उपाय अपनाए जाते।"
अदालत ने आगे कहा कि एकजुटता दिखाने के लिए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विरोध किया जा सकता है, लेकिन पुलिस को आरोपियों को अदालत में पेश करने से रोकना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 225 के तहत अपराध बनता है।
मामले के अनुसार पुलिस ने मादक पदार्थ मामले में दो वकीलों को गिरफ्तार कर पुलिस नियंत्रण कक्ष में रखा था। जब उन्हें हाईकोर्ट परिसर स्थित NDPS मामलों की विशेष अदालत में रिमांड के लिए ले जाया जा रहा था, तब याचिकाकर्ता अधिवक्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया और पुलिस के अनुसार उन्हें अदालत में पेश करने से रोकने का प्रयास किया।
हाईकोर्ट की सुरक्षा समिति ने घटना के वीडियो देखने के बाद माना कि वकीलों ने लोक सेवकों को उनके वैधानिक कर्तव्य के निर्वहन से रोका। इसके बाद बार काउंसिल को शिकायत भेजी गई और रजिस्ट्रार (प्रशासन) की शिकायत पर IPC की धाराओं 186, 152 और 225 के तहत FIR दर्ज की गई।
याचिकाकर्ता वकीलों ने अदालत में कहा कि उन्होंने केवल शांतिपूर्ण विरोध किया, क्योंकि पुलिस ने दो अधिवक्ताओं को गलत तरीके से गिरफ्तार किया। उनका कहना था कि उन्होंने केवल अपने साथी वकीलों के समर्थन में लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग किया।
अदालत ने पाया कि धारा 186 के तहत आवश्यक शिकायत के बिना FIR दर्ज नहीं की जा सकती थी। वहीं धारा 152 के संबंध में FIR में ऐसा कोई आरोप नहीं था कि पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान धमकाया गया या उन पर हमला किया गया हो।
हालांकि, अदालत ने कहा कि धारा 225 प्रथमदृष्टया लागू होती है, क्योंकि उपलब्ध वीडियो से यह संकेत मिलता है कि पुलिस को गिरफ्तार अधिवक्ताओं को अदालत में पेश करने से रोका गया।
फिर भी अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि घटना वर्ष 2023 की थी, जबकि FIR 2025 में दर्ज की गई। साथ ही पुलिस ने गिरफ्तार दोनों वकीलों के खिलाफ आगे कोई कार्रवाई नहीं की और उन्हें थाने से ही जमानत दी थी।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता वकीलों 10 दिनों के भीतर अपने आचरण पर खेद व्यक्त करते हुए शपथपत्र दाखिल कर दें, तो उनके खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी जाएगी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जो वकीलों ऐसा शपथपत्र दाखिल नहीं करेंगे, उनके खिलाफ IPC की धारा 225 के तहत कार्यवाही जारी रहेगी।