कानून में कोई स्पष्ट रोक न होने पर लिमिटेशन एक्ट के तहत देरी को माफ़ किया जा सकता है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-05-10 13:55 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला दिया कि जहां किसी कानून में देरी को माफ़ करने पर स्पष्ट रोक न हो, वहां अधिकारी आवेदन, अपील, पुनर्विचार या कानूनी उपाय का लाभ उठाने में हुई देरी को माफ़ करने के लिए लिमिटेशन एक्ट के प्रावधानों की मदद ले सकते हैं।

कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि अधिकारी याचिकाकर्ता के ज़्यादा स्टांप ड्यूटी वापस पाने के दावे की खूबियों की जांच करने में नाकाम रहे और उन्होंने केवल देरी के आधार पर ही उसे खारिज किया।

जस्टिस दीपक खोट की बेंच ने यह टिप्पणी की:

"जिन मामलों में कानून या प्रक्रिया के तहत कोई स्पष्ट रोक नहीं लगाई गई, वहां लिमिटेशन एक्ट के प्रावधानों की मदद लेकर आवेदन, अपील, पुनर्विचार या कानूनी उपाय का लाभ उठाने में हुई देरी को माफ़ किया जा सकता है।"

तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने पंजीकरण के लिए सब-रजिस्ट्रार के सामने एक विक्रय-पत्र (सेल डीड) पेश किया और उस पर उचित स्टांप ड्यूटी लगाई। हालांकि, सब-रजिस्ट्रार ने दस्तावेज़ की जांच करते समय यह राय बनाई कि उस पर पर्याप्त स्टांप ड्यूटी नहीं लगी है। इसलिए अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी जमा करना ज़रूरी है।

हालांकि, याचिकाकर्ता को मौखिक रूप से यह बताया गया कि यदि पर्याप्त स्टांप ड्यूटी नहीं लगाई जाती है तो विक्रय-पत्र का पंजीकरण प्रमाणित नहीं किया जाएगा, लेकिन यह जानकारी काफ़ी देरी से दी गई।

याचिकाकर्ता के अनुसार, यह बताया गया कि अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी लगाने के बाद विक्रय-पत्र को 31 मार्च, 2013 को पंजीकरण के लिए दोबारा जमा किया गया। इस प्रकार, विक्रय-पत्र पंजीकृत हो गया और याचिकाकर्ता को सौंप दिया गया।

हालांकि, बाद में याचिकाकर्ता को पता चला कि संबंधित ज़मीन ग्राम पंचायत की सीमा के भीतर आती है, न कि नगर निगम की सीमा के भीतर। इसलिए अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी की माँग अवैध और अनुचित थी। इसी आधार पर उस स्टांप ड्यूटी की वापसी के लिए आवेदन दायर किया गया।

बाद में कलेक्टर ने रजिस्ट्रार और सब-रजिस्ट्रार से इस मामले पर राय मांगी और फिर याचिकाकर्ता को सूचित किया कि चूंकि उसका आवेदन 'इंडियन स्टांप ड्यूटी एक्ट' की धारा 45(2) के तहत निर्धारित तीन महीने की अवधि बीत जाने के बाद किया गया, इसलिए उस पर विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

परिणामस्वरूप, 4 अप्रैल, 2014 के आदेश द्वारा स्टांप ड्यूटी की वापसी का आवेदन खारिज किया गया। इसके बाद आवेदक ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि रिफंड के लिए उनका आवेदन सिर्फ़ इस आधार पर खारिज किया गया कि इसे रजिस्ट्रेशन की तारीख से तीन महीने की अवधि के बाद दायर किया गया। वकील के अनुसार, देरी सिर्फ़ एक महीने की थी और इसे माफ़ किया जा सकता था।

प्रतिवादियों के वकील ने दलील दी कि रिफंड का आवेदन तीन महीने के भीतर दायर करने का एक सख़्त प्रावधान है। इसलिए समय सीमा को बढ़ाया नहीं जा सकता। वकील ने दलील दी कि जब क़ानून में 'लिमिटेशन एक्ट' (परिसीमन अधिनियम) को लागू करने का कोई प्रावधान नहीं है तो यह माना जाएगा कि यह लागू नहीं होता है।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता क़ानून के अनुसार रिफंड और उचित ब्याज का हकदार था। हालांकि, प्रतिवादियों ने मामले के गुण-दोष की जांच नहीं की थी। पीठ ने फ़ैसला सुनाया कि जिन मामलों में स्टाम्प ड्यूटी ज़रूरी राशि से ज़्यादा चुकाई गई, वहां अधिकारियों को मामले के गुण-दोष पर विचार करना चाहिए था।

पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले 'नांजी दाना पटेल बनाम महाराष्ट्र राज्य' (WP No. 1897/2019) का भी हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया कि उपचार (Remedy) पर तो समय सीमा की रोक लग सकती है, लेकिन पक्षों के अधिकार पर नहीं।

इस प्रकार, पीठ ने 4 अप्रैल, 2014 का विवादित आदेश रद्द किया और मामले को वापस संबंधित प्राधिकरण के पास भेज दिया, ताकि वे आवेदन पर उसके गुण-दोष के आधार पर फ़ैसला कर सकें।

Case Title: M/s Betul Town v State of Madhya Pradesh, WP-14843-2014

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