S.223 BNSS | आरोपी को सुनवाई का मौका देने का मतलब यह नहीं कि संज्ञान लेने से पहले उसे सारे सबूत दिए जाएं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि, हालांकि BNSS की धारा 223 का परंतुक (proviso) मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने से पहले अपनाई जाने वाली प्रक्रिया निर्धारित करता है, जिसमें आरोपी को सुनवाई का मौका देना अनिवार्य है। फिर भी ऐसा मौका अपने आप में यह बाध्यता नहीं बन जाता कि आरोपी को शुरुआती चरण में ही सारे सबूत उपलब्ध कराए जाएं।
धारा 223 (1) में कहा गया कि अधिकार क्षेत्र रखने वाला कोई भी मजिस्ट्रेट किसी शिकायत पर किसी अपराध का संज्ञान लेते समय शिकायतकर्ता और यदि कोई हो तो उपस्थित गवाहों की शपथ पर जांच करेगा। ऐसी जांच का सार लिखित रूप में दर्ज किया जाएगा, जिस पर शिकायतकर्ता, गवाहों और मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर होंगे।
पहला परंतुक कहता है कि बशर्ते मजिस्ट्रेट द्वारा किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लिया जाएगा, जब तक कि आरोपी को सुनवाई का मौका न दिया गया हो।
जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने टिप्पणी की:
"BNSS की धारा 223(1) का परंतुक यह सुनिश्चित करने के लिए है कि संज्ञान लेने से पहले आरोपी की बात सुनी जाए। हालांकि, ऐसा मौका अपने आप में यह बाध्यता नहीं बन जाता कि शुरुआती चरण में ही सारे सबूत उपलब्ध कराए जाएं, खासकर तब, जब कार्यवाही संज्ञान लेने पर विचार करने के चरण में हो।"
आवेदक-शिकायतकर्ता विनय प्रकाश सिंह ने दावा किया कि वह एक निर्माण कंपनी को Hyva डंपरों के माध्यम से बजरी की आपूर्ति करने का वैध व्यवसाय करता था। शिकायत के अनुसार, 30 अक्टूबर, 2023 को परिचालन उद्देश्यों के लिए लगभग 1800 लीटर डीजल खरीदा गया, जिसे पास में कोई ईंधन स्टेशन न होने के कारण अस्थायी रूप से उसके फार्महाउस पर रखा गया।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि पिछली व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता के कारण प्रतिवादियों (जिनमें पुष्पेंद्र सिंह और दो अन्य शामिल थे) ने उस पर ₹1 करोड़ का अवैध अग्रिम भुगतान करने का दबाव डाला और उसे झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी दी।
आगे यह भी आरोप लगाया गया कि उसी शाम, प्रतिवादी, कुछ पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर, अवैध रूप से फार्महाउस में घुस आए। उन्होंने शिकायतकर्ता के साथ मारपीट की, उसे धमकाया और बिना किसी वैध जब्ती प्रक्रिया के जबरन ईंधन उठा ले गए।
आवेदक ने यह भी दावा किया कि बाद में मऊगंज पुलिस स्टेशन में डकैती का आरोप लगाते हुए, जो FIR दर्ज की गई, वह उसके खिलाफ कथित रूप से किए गए अवैध कृत्यों से बचने के लिए एक जवाबी कार्रवाई (Counterblast) के तौर पर मनगढ़ंत तरीके से तैयार की गई। उसने अभियोजन पक्ष की कहानी को चुनौती देने के लिए इलेक्ट्रॉनिक सबूतों, जिसमें CCTV फुटेज भी शामिल था, पर भरोसा किया।
शिकायतकर्ता ने एक निजी शिकायत दर्ज की, जिसमें IPC की धाराओं के तहत जानबूझकर चोट पहुंचाने (धारा 323), अश्लील गाने और हरकतें करने (धारा 294), आपराधिक धमकी देने (धारा 506), और साझा इरादे को आगे बढ़ाने के लिए किए गए कार्यों (धारा 34) के आरोप लगाए गए।
कार्यवाही के दौरान, आवेदक ने BNSS की धारा 223(1) के तहत एक आवेदन दायर किया, जिसमें यह तर्क दिया गया कि हालांकि यह प्रावधान संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देता है, लेकिन यह उस चरण पर पूरे सबूत उपलब्ध कराने को अनिवार्य नहीं बनाता।
हालांकि, 17 जनवरी, 2026 के आदेश द्वारा मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता को सभी दस्तावेज़ और इलेक्ट्रॉनिक सबूत प्रस्तावित आरोपी को उपलब्ध कराने का यह देखते हुए निर्देश दिया कि ऐसे खुलासे के बिना एक सार्थक सुनवाई नहीं की जा सकती। अदालत ने आगे निर्देश दिया कि निर्देशों का पालन न करने पर शिकायत खारिज कर दी जाएगी।
इसके बाद 22 जनवरी, 2026 को शिकायत को केवल उक्त निर्देशों का पालन न करने के कारण खारिज कर दिया गया। इससे व्यथित होकर आवेदक ने BNSS की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जो हाईकोर्ट को दुर्भावनापूर्ण FIR या आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का अधिकार देती है।
अदालत ने टिप्पणी की कि धारा 528 के तहत हस्तक्षेप का दायरा कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना है, लेकिन इसके लागू होने के लिए,अदालत को यह जांचने की आवश्यकता है कि क्या विवादित आदेश में कोई अवैधता, विकृति या कोई बड़ी अनियमितता है।
अदालत ने पाया कि 22 जनवरी, 2026 का आदेश यह दर्शाता था कि शिकायत को केवल दस्तावेज़ उपलब्ध न कराने के कारण खारिज किया गया। पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि BNSS की धारा 223(1) का प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन हो, जिसका अर्थ है कि संज्ञान लिए जाने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर मिले।
हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा अवसर अपने आप ही संज्ञान लेने के प्रारंभिक चरण में पूरे सबूत उपलब्ध कराने के दायित्व में नहीं बदल जाता है।
अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट से चूक हुई और उसे यह जांच करनी चाहिए थी कि क्या विवादित आदेश का आंशिक पालन पर्याप्त था।
अदालत ने यह फैसला दिया,
"गंभीर आरोपों वाली किसी शिकायत को उसके गुण-दोष या प्रक्रियागत निष्पक्षता की पूरी तरह से जांच किए बिना यांत्रिक रूप से खारिज कर देना न्याय के हनन का कारण बनता है।"
अतः, अदालत ने याचिका स्वीकार की और विवादित आदेश रद्द की। अदालत ने आगे शिकायत मामला बहाल किया और ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार आगे बढ़ने का निर्देश दिया।
Case Title: Vinay Pratap Singh v Pushpendra Singh, MCRC-17776-2026