28 साल नौकरी कराने के बाद कर्मचारी को हटाना अनुचित, नियमित करें सेवा: एमपी हाईकोर्ट का राज्य सरकार को आदेश

Update: 2026-07-18 12:57 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने करीब 28 वर्ष की सेवा के बाद एक कर्मचारी की नियुक्ति यह कहते हुए समाप्त किए जाने का आदेश रद्द किया कि राज्य सरकार को उसे हटाने के बजाय प्रत्यक्ष भर्ती वाले उपयुक्त पद पर नियमित करना चाहिए था।

अदालत ने कहा कि कर्मचारी ने नियुक्ति पाने के लिए न तो कोई धोखाधड़ी की और न ही कोई गलत जानकारी दी थी।

जस्टिस दीपक खोत की एकलपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि कर्मचारी की सेवाओं को प्रत्यक्ष भर्ती वाले उपयुक्त पद पर नियमित किया जाए। यदि वह पद कम वेतनमान वाला भी हो तब भी नियमों के अनुसार उसका समायोजन किया जा सकता है।

अदालत ने कहा,

"कल्याणकारी राज्य किसी ऐसे कर्मचारी को, जिसने विभाग में सम्मानजनक अवधि तक सेवा दी हो, इतनी लंबी सेवा के बाद नौकरी से नहीं हटा सकता। राज्य को उसे सेवा से हटाने के बजाय प्रत्यक्ष भर्ती वाले पद पर नियमित करने का निर्णय लेना चाहिए था।"

मामले के अनुसार याचिकाकर्ता वर्ष 1985 में रोजगार कार्यालय के माध्यम से नगर एवं ग्राम निवेश विभाग में दफ्तरी के रिक्त पद पर दैनिक वेतनभोगी के रूप में नियुक्त हुआ। बाद में उसे छह माह के लिए तदर्थ आधार पर नियुक्त किया गया, जिसे समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा।

वर्ष 1987 से 1990 के बीच उसकी सेवा लगातार बढ़ाई गई और उसे विशेष वेतन का लाभ भी मिला। वर्ष 1990 में राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी कर याचिकाकर्ता सहित अन्य कर्मचारियों की सेवाएं नियमित कर दीं। इसके बाद उसका नाम लगातार वरिष्ठता सूची में शामिल रहा।

बाद में विभागीय पदोन्नति समिति की अनुशंसा पर उसे द्वितीय क्रमोन्नत वेतनमान का लाभ दिया गया और वर्ष 2015 में सहायक ग्रेड-3 के पद पर पदोन्नत कर दिया गया।

इसी वर्ष विभाग ने कारण बताओ नोटिस जारी कर कहा कि दफ्तरी का पद पदोन्नति का पद है, इसलिए उस पर उसकी प्रारंभिक नियुक्ति नियमों के अनुरूप नहीं थी। इसके आधार पर उसकी सेवा समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई। अंततः वर्ष 2017 में उसकी नियुक्ति और नियमितीकरण दोनों निरस्त कर दिए गए।

राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि दफ्तरी का पद प्रत्यक्ष भर्ती का नहीं बल्कि पदोन्नति का पद है। इसलिए याचिकाकर्ता की प्रारंभिक नियुक्ति नियमों के विरुद्ध थी और हाईकोर्ट की पूर्व खंडपीठ के निर्देशों के अनुपालन में उसकी सेवाएं समाप्त की गईं।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि नियुक्ति से लेकर पदोन्नति तक विभाग ने कभी भी याचिकाकर्ता की नियुक्ति को अनियमित नहीं माना। उसे समय-समय पर सेवा विस्तार, वेतनमान, नियमितीकरण और पदोन्नति जैसे सभी लाभ दिए गए। केवल अदालत के पूर्व आदेश के बाद ही उसकी नियुक्ति की जांच की गई।

पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में कहीं भी यह नहीं है कि कर्मचारी ने धोखाधड़ी या गलत जानकारी देकर नियुक्ति प्राप्त की थी। न ही यह मामला है कि नियुक्ति देने वाले अधिकारी के खिलाफ कभी कोई विभागीय कार्रवाई की गई हो।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के मामले में राज्य सरकार उनके नियमितीकरण पर विचार कर सकती है भले ही उनकी प्रारंभिक नियुक्ति पूरी तरह नियमित न रही हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि 28 वर्ष तक सेवा लेने के बाद कर्मचारी को नौकरी से हटाना कानून के अनुरूप नहीं है। ऐसे में 18 अक्टूबर 2017 का सेवा समाप्ति आदेश टिक नहीं सकता।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सेवा समाप्ति का आदेश रद्द करते हुए राज्य सरकार को याचिकाकर्ता की सेवाओं को प्रत्यक्ष भर्ती वाले उपयुक्त पद पर नियमित करने का निर्देश दिया।

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