POSH शिकायतों की जांच ICC/LCC तंत्र के बाहर किसी समानांतर जांच प्राधिकरण द्वारा नहीं की जा सकती: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-05-22 12:33 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि यौन उत्पीड़न की रोकथाम अधिनियम (POSH Act), 2013 के तहत शिकायतों की जांच या उनका निपटारा आंतरिक शिकायत समिति (ICC) या स्थानीय शिकायत समिति (LCC) के ढांचे के बाहर किसी भी समानांतर प्राधिकरण द्वारा नहीं किया जा सकता।

जस्टिस आशीष श्रोती की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे किसी समानांतर प्राधिकरण को अनुमति देने से POSH Act का उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा।

पीठ ने कहा:

"यदि किसी नियोक्ता को कार्यस्थल पर किसी महिला द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए ICC या LCC के अलावा कोई समानांतर जांच प्राधिकरण गठित करने की अनुमति दी जाती है, तो इससे POSH Act का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि ऐसे मामलों में जिस गोपनीयता को बनाए रखना आवश्यक है, उसका उल्लंघन होगा और जांच प्राधिकरण पर अनुचित प्रभाव और दबाव पड़ने की भी आशंका रहेगी।"

पीठ ने POSH Act और मध्य प्रदेश सिविल सेवा (CCA) नियम, 1996 के प्रावधानों के बीच के आपसी संबंध पर भी विचार किया और यह टिप्पणी की:

"नियम 14(2)... से यह स्पष्ट होता है कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी दुराचार के आरोपों की जांच के लिए किसी प्राधिकरण को नियुक्त करने हेतु सक्षम है। हालांकि, जब ऐसे आरोप एमपी सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 22(3) के अर्थ के भीतर 'यौन उत्पीड़न' की श्रेणी में आते हैं तो POSH Act के तहत गठित ICC/LCC को ही CCA नियमों के प्रयोजनों हेतु अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा नियुक्त जांच प्राधिकरण माना जाएगा।"

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता राजा मानसिंह तोमर विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। उस पर 26 मार्च, 2025 को कुछ छात्रों द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया। इसके बाद विश्वविद्यालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) विनियम, 2023 के तहत ग्वालियर के माधव कॉलेज के प्राचार्य की अध्यक्षता में पांच सदस्यों वाली एक 'छात्र शिकायत निवारण समिति' (SGRC) का गठन किया। इस घटना की रिपोर्ट पुलिस को भी की गई, जिसने बाद में एक महिला पर उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला करने (धारा 74), यौन उत्पीड़न (धारा 75), और महिला की गरिमा का अपमान करने के इरादे से किए गए कृत्यों (धारा 79) तथा आपराधिक धमकी (धारा 351) के लिए FIR दर्ज की।

SRGC ने एक जांच की और बयान दर्ज किए, लेकिन याचिकाकर्ता ने जाँच में भाग नहीं लिया। समिति की रिपोर्ट के अनुसार, चूंकि शिकायतकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में कोई विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर सका और चूंकि याचिकाकर्ता ने कई बार याद दिलाने के बावजूद जांच में भाग नहीं लिया, इसलिए आगे किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी और पुलिस अधिकारी इस मामले की जांच कर रहे थे।

इसके बाद याचिकाकर्ता का तबादला संस्कृति संचालनालय (संस्कृति निदेशालय), भोपाल कर दिया गया। उक्त आदेश का पालन न करने पर उसे निलंबित कर दिया गया, जिसके बाद उसके खिलाफ आरोप पत्र जारी किया गया। कुलपति द्वारा एक सेवानिवृत्त प्रिंसिपल जिला जज को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट कार्य परिषद को सौंप दी। याचिकाकर्ता की सफाई को अस्वीकार कर दिया गया और उसे सेवामुक्त करने का आदेश जारी कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप यह याचिका दायर की गई।

याचिकाकर्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि यह जाँच अवैध थी और अधिकार क्षेत्र से बाहर थी, क्योंकि एमपी सिविल सेवा (CCA) नियम, 1966 के नियम 14 के तहत यौन उत्पीड़न से संबंधित जांच करने का एकमात्र अधिकार ICC के पास है। वकील ने आगे यह भी तर्क दिया कि यह जांच POSH Act, 2013 के प्रावधानों के विपरीत की गई। इसलिए सेवामुक्ति का यह आदेश मान्य नहीं है।

प्रतिवादियों के वकील ने याचिका की स्वीकार्यता के संबंध में एक प्रारंभिक आपत्ति उठाई, जिसमें उन्होंने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के पास 30 दिनों के भीतर राज्यपाल के समक्ष अपील करने का एक वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है। वकील ने आगे यह भी तर्क दिया कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी, CCA नियमों के तहत, कदाचार (जिसमें यौन उत्पीड़न भी शामिल है) की जांच करने के लिए किसी स्वतंत्र जाँच अधिकारी को नियुक्त कर सकता है।

न्यायालय की टिप्पणियां

न्यायालय ने सबसे पहले यौन उत्पीड़न से संबंधित कानूनों के विकासक्रम का अवलोकन किया, जिसकी शुरुआत विशाखा बनाम राजस्थान राज्य मामले से हुई थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार एक सुदृढ़ तंत्र की आवश्यकता को स्वीकार किया था। इस प्रकार कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम तथा उसके निवारण के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए, जिसके तहत प्रत्येक संगठन के भीतर एक शिकायत निवारण तंत्र और एक समिति का गठन करना अनिवार्य कर दिया गया था।

इसके बाद संसद ने POSH Act पारित किया, जिसने ICC/LCC के माध्यम से कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम, निषेध और निवारण के लिए प्रक्रियाओं को विधिवत संहिताबद्ध किया। अधिनियम की धारा 4 यह अनिवार्य करती है कि प्रत्येक नियोक्ता एक ICC का गठन करे, जबकि धारा 5 उन कार्यस्थलों में LCC का प्रावधान करती है जहाँ ICC उपलब्ध नहीं है। यह अधिनियम स्पष्ट रूप से इस बात पर ज़ोर देता है कि ये समितियां यौन उत्पीड़न की शिकायतों की जाँच के लिए एकमात्र अधिकृत निकाय हैं।

अदालत ने टिप्पणी की,

"धारा 4 और 5 की भाषा एक आदेश देती है, जब वह शिकायत की जांच के लिए 'shall' (अनिवार्य रूप से) शब्द का इस्तेमाल करती है।"

अदालत ने आगे POSH Act की धारा 10 और 11 की जांच की और पाया कि धारा 10 सुलह के प्रयासों की अनुमति देती है, जबकि धारा 11 उन मामलों में औपचारिक जाँच शुरू करना अनिवार्य बनाती है, जहां सुलह विफल हो गई हो।

आगे कहा गया,

"ICC/LCC को उन मामलों के संबंध में CPC के तहत एक सिविल कोर्ट में निहित शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार है, जो स्वयं इस धारा में दिए गए। इस प्रकार, ICC/LCC के पास जांच को तार्किक रूप से निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त शक्तियां हैं।"

एक्ट की धारा 13 का हवाला देते हुए अदालत ने ICC या LCC द्वारा की गई सिफारिशों के दायरे को भी स्पष्ट किया। साथ ही कहा कि वे किसी विशेष सज़ा की सिफारिश नहीं कर सकते, क्योंकि यह अनुशासनात्मक प्राधिकरण का विशेषाधिकार है।

इसके अलावा, अदालत ने SGRC की भूमिका पर भी बात की और कहा कि यह छात्रों की शिकायतों को संभालता है, लेकिन यौन उत्पीड़न की शिकायतों को UGC नियमों के तहत गठित ICC या LCC के माध्यम से निपटाया जाना चाहिए। साथ ही POSH Act के तहत उनकी संरचना और शक्तियों का भी पालन किया जाना चाहिए।

इस प्रकार, अदालत ने निम्नलिखित बिंदुओं के साथ चर्चा को संक्षेप में प्रस्तुत किया:

- यौन उत्पीड़न की कोई भी शिकायत, चाहे वह ICC/LCC को की गई हो या रोज़गार के माध्यम से प्राप्त हुई हो, उसे POSH Act के तहत कार्रवाई के लिए ICC/LCC को भेजा जाना चाहिए।

- ICC/LCC, एमपी सिविल सेवा CAA नियमों के नियम 14 का पालन करते हुए शिकायत की जांच करता है, शिकायत को औपचारिक आरोप-पत्र (chargesheet) मानता है, और अपने निष्कर्ष सक्षम प्राधिकारी को सौंपता है।

- सक्षम प्राधिकारी ICC/LCC की रिपोर्ट को आधिकारिक जांच रिपोर्ट मानता है और एमपी सिविल सेवा CAA नियमों के नियम 15 के अनुसार आगे की कार्रवाई करता है।

निर्णय

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि विश्वविद्यालय के कार्यों ने POSH Act और UGC नियमों का उल्लंघन किया। इसलिए अदालत ने 31 दिसंबर, 2025 के सेवा-समाप्ति आदेश रद्द किया। इसके अलावा, याचिका की स्वीकार्यता (maintainability) पर प्रतिवादी के तर्क को खारिज करते हुए अदालत ने फैसला दिया कि याचिका को किसी वैकल्पिक उपाय के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

जांच ​​के संबंध में पीठ ने निर्देश दिया कि शिकायत को ICC/LCC को भेजा जाए, जो POSH Act के अनुसार जाँच करेगा। न्यायालय ने आगे निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को बहाल किया जाए और जांच लंबित रहने तक उसे स्थानांतरित स्थान पर कार्यभार ग्रहण करने की अनुमति दी जाए।

Case Title: Dr Sajan Kurien Mathew v State of Madhya Pradesh, Writ Petition no 1662 of 2026

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