एक की मौत, दो ने काटी उम्रकैद: 14 साल बाद हाईकोर्ट ने हत्या के दोषियों को किया बरी, सबूत गढ़ने के आरोप में जांच अधिकारी के खिलाफ FIR का आदेश
हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के चौदह साल बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने आठ लोगों को बरी किया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला जांच अधिकारी द्वारा पेश किए गए मनगढ़ंत सबूतों पर आधारित था।
इस बीच दोषियों में से एक की मौत हो गई, जबकि दो ने अपनी उम्रकैद की सज़ा पूरी की और रिहा हो गए।
इस मामले के महत्व को देखते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र की डिवीज़न बेंच ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वे उक्त जांच अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज करें।
कोर्ट ने निर्देश देते हुए कहा,
"कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। परिस्थितियों की कड़ी पूरी नहीं है, सबूत मनगढ़ंत और जाली हैं... यह जांच में गंभीर खामियों की ओर इशारा करता है। साथ ही जांच अधिकारी (IO) मिस्टर रिज़वी, Dy. S.P. के आचरण पर भी सवाल उठाता है। हम पुलिस को पक्षपाती होने की अनुमति नहीं दे सकते, जैसा कि इस मामले में आरोपियों की बेगुनाही के साथ खिलवाड़ करते हुए प्रतीत होता है... इसलिए हम निर्देश देते हैं कि DGP मिस्टर रिज़वी के खिलाफ FIR दर्ज करें और झूठे सबूत बनाने के मामले में जांच करें। उन्होंने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को गढ़कर और उन्हें सही साबित करने के लिए कोर्ट के सामने पेश करके आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की है।"
यह मामला अजय राय की मौत से जुड़ा है। अजय राय फलों का ठेला लगाने वाले एक विक्रेता थे, जिनका कथित तौर पर 31 अक्टूबर, 2009 को अपहरण कर लिया गया और पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, राजकुमार पटेल और आरती पटेल अजय राय को उनकी दुकान से अपने साथ ले गए। इसके बाद कथित तौर पर उन्हें मोहन पटेल के घर ले जाया गया, जहां आरोपियों के एक समूह ने उन पर हमला किया। मोहन पटेल को मुख्य आरोपी के तौर पर पेश किया गया, जिसने हमले की अगुवाई की थी; जबकि राजकुमार पटेल पर मृतक को बहला-फुसलाकर ले जाने में अहम भूमिका निभाने का आरोप है।
कल्याण पटेल और रामजी पटेल पर इस अपराध में शामिल होने का आरोप है। उन्हें मृतक की निजी चीज़ों—जिसमें एक मोटरसाइकिल, एक पर्स और एक ब्रेसलेट शामिल था—की बरामदगी से जोड़ा गया। शेष आरोपी—संतोष अहिरवार, मोनू उइके, मधु यादव, मनीष यादव और नितेश वंशंकर—पर एक गैर-कानूनी जमावड़े का हिस्सा होने और मृतक की पिटाई में शामिल होने का आरोप है। हालांकि, उनके द्वारा किए गए किसी विशिष्ट व्यक्तिगत कृत्य का कोई ज़िक्र नहीं है। ऊपर बताए गए सभी आरोपियों ने अपील दायर की, जिसमें उन्होंने प्रिंसिपल एडिशनल जज द्वारा दी गई सज़ा और दोषसिद्धि को चुनौती दी थी।
जज ने उन्हें IPC की धारा 120B (आपराधिक साज़िश), धारा 147 (दंगा), धारा 364 (अपहरण), धारा 302 (हत्या) और धारा 149 (गैर-कानूनी जमावड़ा) के तहत दोषी ठहराया था। इन व्यक्तियों को आजीवन कारावास और दो साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई।
अदालत को बताया गया कि अपीलकर्ता नंबर 1, बाबू, की 2025 में मृत्यु हो गई। अपीलकर्ता नंबर 6, कल्याण पटेल तथा अपीलकर्ता नंबर 7, रामजी पटेल, को पक्षकारों की सूची से हटा दिया गया, क्योंकि उन्होंने अपनी सज़ा पूरी की थी।
अदालत ने जांच में कई गंभीर खामियां पाईं, विशेष रूप से जांच अधिकारी रिज़वी की भूमिका को लेकर। अदालत ने पुलिस द्वारा सबूतों को संभालने के तरीके में गंभीर विसंगतियाँ पाईं, जिनमें जाली दस्तावेज़ और ऐसी गवाहियां शामिल हैं, जो जान-बूझकर हेर-फेर की हुई लग रही हैं।
अदालत ने यह भी माना कि परिस्थितिजन्य सबूतों की कड़ी अधूरी है, गवाह अविश्वसनीय है और मुख्य सबूत जाली है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा जिन गवाहियों पर भरोसा किया गया, वे विरोधाभासों से भरी हुईं। इसके अलावा, पीठ ने मृतक द्वारा कथित तौर पर दिए गए उस मौखिक मृत्यु-पूर्व बयान पर भी संदेह व्यक्त किया, जिसमें उसने आरोपियों का नाम लिया था; क्योंकि यह बयान 'मर्ग सूचना' (Merg Information) और FIR में दर्ज नहीं था।
पीठ ने मृतक के कपड़ों के संबंध में भी मनगढ़ंत सबूत पाए। पीठ ने पाया कि रिज़वी ने दावा किया कि उसने मृतक के कपड़े आरोपियों में से एक मोहन पटेल के घर से बरामद किए। हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि जब मृतक का शव मिला था, तब उसने अलग कपड़े पहने हुए थे।
अदालत ने पाया कि जांच को बहुत ही गलत तरीके से अंजाम दिया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि जांच अधिकारी ने अभियोजन पक्ष के मामले को मज़बूत करने के लिए मनगढ़ंत गवाहियां तैयार की थीं और जाली दस्तावेज़ बनाए।
इसलिए पीठ ने टिप्पणी की:
"अतः, हमारी राय है कि यह मामला एक 'खराब जांच' (botched-up investigation) का शिकार हुआ। जांच अधिकारी स्वयं जांच में एक 'हितबद्ध पक्ष' (interested party) बन गया और उसने जाँच को पूरी तरह से बिगाड़ दिया। उसने झूठी गवाही दी। उसने जाली दस्तावेज़ तैयार किए, जैसा कि मोहन पटेल के घर से मृतक अजय राय के कपड़े ज़ब्त करने संबंधी 'ज़ब्ती-मेमो' (seizure memo) से स्पष्ट होता है।"
इसलिए पीठ ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वे जांच अधिकारी (IO) रिज़वी द्वारा प्रस्तुत किए गए जाली दस्तावेज़ों और गवाहियों की जांच करें, जिसमें अजय राय के कपड़ों की ज़ब्ती-मेमो भी शामिल है। अतः, न्यायालय ने सभी अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि रद्द की और उनकी रिहाई का आदेश दिया, बशर्ते कि किसी अन्य मामले में उनकी आवश्यकता न हो।
Case Title: Madhu Yadav v State of Madhya Pradesh [CRA-2011-2012]