BREAKING| मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने लिंचिंग केस के फ़ैसले के बाद जज को मिली धमकियों पर स्तव:संज्ञान लिया, सुरक्षा के निर्देश दिए

Update: 2026-07-03 06:11 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार (1 जुलाई) को उन खबरों पर खुद संज्ञान लिया, जिनमें लिंचिंग केस में 'गो-रक्षकों' (cow vigilantes) के खिलाफ़ फ़ैसला सुनाने वाली जज को सांप्रदायिक धमकियां मिलने की बात कही गई थी।

यह देखते हुए कि ऐसी धमकियां "हमारे न्यायिक अधिकारियों की न्यायिक स्वतंत्रता और निडर होकर काम करने की क्षमता में सीधे तौर पर बाधा डालती हैं", कोर्ट ने मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और अतिरिक्त मुख्य सचिव/प्रधान सचिव (गृह) से नर्मदापुरम ज़िले की एडिशनल ज़िला एवं सेशन जज तबस्सुम खान की सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों के बारे में व्यक्तिगत रूप से जानकारी मांगी।

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की डिवीज़न बेंच ने राज्य में न्यायिक अधिकारियों से जुड़े एक लंबित 'सुओ मोटो' (स्वत: संज्ञान लेने वाले) मामले की सुनवाई के दौरान 1 जुलाई को यह आदेश पारित किया।

दो दिन पहले 'लाइव-लॉ' (LiveLaw) ने उन ऑनलाइन पोस्ट के बारे में रिपोर्ट किया था, जिनमें जज को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया और धमकियां दी गईं। यह धमकियां तब दी गईं, जब उन्होंने 2022 में ट्रक ड्राइवर शेख लाला नज़ीर अहमद की गो-तस्करी के शक में की गई लिंचिंग के मामले में 7 लोगों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।

इस घटनाक्रम को "गंभीर मामला" बताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा व्यवहार सीधे तौर पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमज़ोर करता है।

कोर्ट ने कहा,

"हमारी राय है कि ऐसी गतिविधियां हमारे न्यायिक अधिकारियों की न्यायिक स्वतंत्रता और निडर होकर काम करने की क्षमता में सीधे तौर पर बाधा डालती हैं।"

अंतरिम उपाय के तौर पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि नर्मदापुरम के पुलिस अधीक्षक (SP) के माध्यम से जज तबस्सुम खान के लिए पुलिस सुरक्षा जारी रखी जाए।

हालांकि, राज्य ने कोर्ट को बताया कि सुरक्षा पहले ही दी जा चुकी है, फिर भी बेंच ने पुलिस अधीक्षक को हलफनामा (affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया। इसमें धमकियां देने के लिए ज़िम्मेदार कथित उपद्रवियों के खिलाफ़ की गई कार्रवाई की जानकारी देनी होगी।

डिप्टी एडवोकेट जनरल अभिजीत अवस्थी ने कोर्ट को बताया कि इस घटना के संबंध में पहले ही FIR दर्ज की जा चुकी है।

बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायिक आदेश कानून के तहत अपील या पुनरीक्षण (Revisional) जांच के दायरे में आते हैं और वे जजों को डराने-धमकाने का आधार नहीं बन सकते।

आगे कहा गया,

"हमारा मानना ​​है कि न्यायिक अधिकारी द्वारा पारित किसी भी आदेश की न्यायिक समीक्षा हो सकती है - चाहे वह अपील के ज़रिए हो या पुनरीक्षण (revision) के ज़रिए - लेकिन किसी न्यायिक अधिकारी को सिर्फ़ इसलिए धमकाया नहीं जा सकता कि उन्होंने कोई खास आदेश दिया है जो समाज के किसी वर्ग को पसंद नहीं आया।"

बेंच ने एडिशनल एडवोकेट जनरल को निर्देश दिया कि वह इस मामले का संज्ञान लें और ज़िम्मेदार उपद्रवियों के ख़िलाफ़ उठाए जा रहे कदमों के बारे में डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस और एडिशनल चीफ़ सेक्रेटरी का व्यक्तिगत हलफ़नामा (affidavit) दाखिल करें।

Tags:    

Similar News