'डोमिनो इफ़ेक्ट शुरू हो जाएगा': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पद अलॉट होने के बाद सरकारी परीक्षा में उम्मीदवार की पसंद बदलने की याचिका खारिज की

Update: 2026-04-03 04:01 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने गुरुवार (2 अप्रैल) को उम्मीदवार की याचिका खारिज की, जिसमें उसने 2024 के संयुक्त भर्ती टेस्ट में पद के लिए अपनी पसंद बदलने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी एक उम्मीदवार को अपनी पसंद पहली से बदलकर 36वीं करने की इजाज़त दी गई तो इससे 'डोमिनो इफ़ेक्ट' शुरू हो जाएगा, जिससे पूरे राज्य में पदों के बंटवारे का सिस्टम बिगड़ जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि इससे तीसरे पक्षों के पहले से मिले अधिकारों का भी उल्लंघन होगा।

जस्टिस जय कुमार पिल्लई की बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया:

"अगर यह कोर्ट किसी उम्मीदवार को अंतिम नतीजे घोषित होने के बाद अपनी पहली पसंद को मनमाने ढंग से छोड़कर 36वीं पसंद पर दावा करने की इजाज़त देता है तो इससे एक विनाशकारी 'डोमिनो इफ़ेक्ट' शुरू हो जाएगा। इससे पूरे राज्य में पदों के बंटवारे का सिस्टम बुरी तरह बिगड़ जाएगा और तीसरे पक्षों—जैसे कि प्रतिवादी नंबर 4 और 5—के पहले से मिले अधिकारों का गैर-कानूनी रूप से उल्लंघन होगा। इन लोगों को प्रकाशित नियमों के मुताबिक ही सही तरीके से वे सीटें अलॉट की गईं।"

याचिकाकर्ता ने एक रिट याचिका दायर करके कर्मचारी चयन बोर्ड (प्रतिवादी नंबर 3) द्वारा 24 नवंबर, 2025 को जारी की गई चयन सूची को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने 'सर्टिओरारी' रिट की मांग की ताकि चयन सूची को उस हद तक रद्द किया जा सके, जिस हद तक उसमें कर्मचारी चयन बोर्ड में 'असिस्टेंट ग्रेड III' के पद के लिए निजी व्यक्तियों (प्रतिवादी नंबर 4 और 5) के नामों की सिफारिश की गई।

याचिकाकर्ता ने इसके अलावा 'मैंडेमस' रिट की भी मांग की थी, जिसमें प्रतिवादियों को निर्देश देने की बात कही गई कि वे 2024 के संयुक्त भर्ती टेस्ट में 'ग्रुप 4 असिस्टेंट ग्रेड 3' में उसकी अच्छी मेरिट के आधार पर उसके द्वारा जमा किए गए पसंद के क्रम की परवाह किए बिना उसे उक्त पद पर नियुक्ति के लिए विचार करें।

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता ने 'क्लास III ग्रुप 4' पद के लिए अपना ऑनलाइन आवेदन फॉर्म भरा था और अपनी पसंद का क्रम जमा किया। उसने 'असिस्टेंट ग्रेड-III-सह-स्टेनो टाइपिस्ट-सह-कंप्यूटर ऑपरेटर' (कोड 144) को अपनी पहली पसंद के तौर पर चुना था, जबकि जिस पद (कोड नंबर 83) की मांग वह इस याचिका में कर रहा है, वह उसकी पसंद की सूची में 36वें नंबर पर था।

याचिकाकर्ता ने 99.927273 परसेंटाइल अंक हासिल किए और उसे उसकी पहली पसंद, यानी असिस्टेंट ग्रेड-III-कम-स्टेनो टाइपिस्ट-कम-कंप्यूटर ऑपरेटर का पद आवंटित किया गया। इस प्रकार, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और यह दावा किया कि ज़्यादा अंक हासिल करने के बावजूद, पद संख्या 83 के लिए उसके नाम की सिफ़ारिश नहीं की गई।

याचिकाकर्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि उसने पसंद का क्रम (Preference Order) बेतरतीब ढंग से भरा था। सिर्फ़ इसलिए कि उसने क्रम संख्या 36 पर पद कोड 83 को चुना था, उसे उसकी नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

पीठ ने यह टिप्पणी की कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा केवल उन्हीं मामलों में लागू हो सकती है, जहां चयन प्रक्रिया स्पष्ट अवैधता, मनमानी या वैधानिक नियमों से घोर विचलन के कारण दूषित हो गई हो।

पीठ ने विज्ञापन के नियमों की आगे जांच की और यह पाया कि ये नियम उम्मीदवार पर स्पष्ट रूप से एक अनिवार्य कर्तव्य डालते हैं कि वह सभी पात्र पदों के लिए अपनी पसंद दर्ज करे। साथ ही इसमें स्पष्ट रूप से यह चेतावनी भी दी गई कि उम्मीदवार को केवल उसी पद के लिए विचारित किया जाएगा, जिसे उसने आवेदन पत्र में भरा है, चाहे उसने कितने भी अंक हासिल किए हों।

इसके अतिरिक्त, पीठ ने इस बात पर भी ज़ोर दिया:

" 'योग्यता-सह-पसंद' (Merit-cum-Preference) पद्धति का मूल उद्देश्य योग्य उम्मीदवार को वह विशिष्ट पद हासिल करने में सक्षम बनाना है, जिसे वह अपने लिए सबसे उपयुक्त मानता है। यह एक ऐसा सामंजस्यपूर्ण मिश्रण है, जिसमें योग्यता यह निर्धारित करती है कि उम्मीदवार को चुनने का अवसर कब मिलेगा, और पसंद यह निर्धारित करती है कि उसे कौन-सा पद आवंटित किया जाएगा।"

अतः, याचिकाकर्ता के इस तर्क को कि उसकी योग्यता की अनदेखी की गई, पीठ द्वारा अस्वीकार कर दिया गया; पीठ ने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को उसकी सबसे पहली पसंद का पद ही आवंटित किया गया।

बेंच ने आगे इस बात पर ज़ोर दिया कि एक बार जब कोई उम्मीदवार उच्च मेरिट हासिल कर लेता है और उसे सफलतापूर्वक उसकी सबसे पहली पसंद आवंटित हो जाती है तो उस विशेष उम्मीदवार के लिए आवंटन प्रक्रिया अंतिम मानी जाती है। इसलिए, बेंच ने यह माना कि उस उम्मीदवार का नाम अगली मेरिट सूची में, उसकी पसंद के क्रम में काफी नीचे रखी गई किसी पोस्ट के लिए लगातार शामिल करते रहना प्रक्रियात्मक रूप से गलत और व्यावहारिक रूप से असंभव था।

बेंच ने माना कि याचिकाकर्ता का यह दावा कि उसने फॉर्म बिना सोचे-समझे (Randomly) भरा था, उसकी ओर से "पूरी तरह से लापरवाही" को दर्शाता है और इसका इस्तेमाल एक पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया को खत्म करने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता।

अदालत ने आगे कहा,

"किसी भी उम्मीदवार से यह उम्मीद की जाती है कि वह एक वैधानिक आवेदन पत्र भरते समय सामान्य विवेक से काम ले। याचिकाकर्ता ने स्वेच्छा से चयन प्रक्रिया में भाग लिया, स्पष्ट रूप से 'पोस्ट कोड 144' को अपनी पहली पसंद (Preference #1) के रूप में लॉक किया और जान-बूझकर 'पोस्ट कोड 83' को 36वीं पसंद (Preference #36) पर रखा। खेल के नियमों पर सहमति देने और अपनी सबसे पहली पसंद हासिल करने का लाभ उठाने के बाद, याचिकाकर्ता अब उस प्रक्रिया को चुनौती देकर 'दोहरी चाल' (Approbate and Reprobate) नहीं चल सकता, जिसने उसकी अपनी ही मांग का सम्मान किया था। उसकी यह शिकायत पूरी तरह से उसकी अपनी ही गलती का नतीजा है।"

इसके अलावा, बेंच ने समझाया कि यदि किसी एक उम्मीदवार को अपनी पसंद (Preference) को पहली से बदलकर 36वीं करने की अनुमति दी जाती है तो इससे एक 'डोमिनो इफ़ेक्ट' (श्रृंखला प्रभाव) शुरू हो जाएगा; क्योंकि इससे पूरे राज्य की आवंटन व्यवस्था (Allocation Matrix) बिगड़ जाएगी और तीसरे पक्षों (अन्य उम्मीदवारों) के स्थापित अधिकारों का उल्लंघन होगा।

इसलिए याचिकाकर्ता की याचिका खारिज कर दी गई।

Case Title: Jitendra Mewade v State of Madhya Pradesh [W.P. No.48259/2025]

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