वसुंधरा राजे के 'फर्जी पत्र' विवाद को लेकर पुलिस पर तीन लोगों को अवैध रूप से हिरासत में रखने का आरोप, हाईकोर्ट ने दिए जांच के आदेश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार को मजिस्ट्रेट कोर्ट को निर्देश दिया कि वह उन तीन लोगों के बयान दर्ज करे, जिन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें बिना कोर्ट में पेश किए लगभग दो दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा। इन लोगों पर राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से जुड़ा कथित पत्र फैलाने का आरोप है, जिसमें विभिन्न मुद्दों पर BJP के रुख की आलोचना की गई।
राज्य सरकार और याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश किए गए विरोधाभासी बयानों को संज्ञान में लेते हुए चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने निर्देश दिया:
"हम मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देश देते हैं कि वे एक अधिकारी को नियुक्त करें, जो तीनों व्यक्तियों (Corpus) के बयान अलग-अलग दर्ज करे। इन बयानों में यह पूछा जाए कि जिस समय मध्य प्रदेश पुलिस ने कथित तौर पर उनसे संपर्क किया था, तब से लेकर जयपुर में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने तक उनके साथ क्या-क्या हुआ। बयान आज ही दर्ज किए जाएं। उसके बाद तीनों व्यक्तियों को वापस जयपुर भेज दिया जाए ताकि वे सक्षम अदालत द्वारा लगाई गई जमानत की शर्तों का पालन कर सकें।"
इन तीनों लोगों ने 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि 20 अप्रैल की सुबह-सवेरे भोपाल पुलिस (साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन) ने उन्हें उठा लिया था और बिना किसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए लगभग दो दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा।
NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, ये लोग कांग्रेस IT सेल के कार्यकर्ता बताए जा रहे हैं। भोपाल पुलिस ने इन्हें राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का "फर्जी पत्र" फैलाने के आरोप में हिरासत में लिया था। इस पत्र में कथित तौर पर महिलाओं के लिए आरक्षण विधेयक (Women's Reservation Bill) सहित विभिन्न मुद्दों पर BJP के रुख की आलोचना की गई थी।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने यह तर्क दिया कि इन लोगों को न तो औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया और न ही ट्रांजिट रिमांड के लिए कोर्ट में पेश किया गया। इसके बजाय, कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही उन्हें राजस्थान पुलिस के हवाले कर दिया गया। अपनी दलीलों को पुष्ट करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने भोपाल स्थित 'पुलिस परिवहन और अनुसंधान संस्थान' (Police Transport and Research Institute) के CCTV फुटेज का भी हवाला दिया।
याचिकाकर्ताओं ने पहले यह दलील दी थी कि बंदी (Corpus) को कभी गिरफ्तार नहीं किया गया। उनमें से दो को 20 अप्रैल को सुबह 3:00 बजे से हिरासत में रखा गया था और तीसरे को 20 अप्रैल को सुबह 10 बजे से तब तक हिरासत में रखा गया, जब तक कि राजस्थान पुलिस के अधिकारी 21 अप्रैल को उन्हें गैर-कानूनी तरीके से अपने साथ नहीं ले गए।
जैसा कि अदालत के 22 अप्रैल के आदेश में दर्ज है, राज्य ने पहले यह दलील दी थी कि इन व्यक्तियों को शुरू में 20 अप्रैल को राजस्थान पुलिस से मिली मौखिक जानकारी के आधार पर पूछताछ के लिए बुलाया गया था। उसी दिन उन्हें घर लौटने की अनुमति दी गई, क्योंकि वे सहयोग कर रहे हैं।
इसके बाद राज्य के डिप्टी-एडवोकेट जनरल ने यह दलील दी कि रात लगभग 8:30 बजे राजस्थान पुलिस से एक टेलीफोन कॉल आया, जिसमें FIR दर्ज करने और बंदी को तब तक हिरासत में रखने के लिए कहा गया, जब तक कि वे (राजस्थान पुलिस) उन्हें अपनी हिरासत में लेने के लिए नहीं आ जाते। यह कहा गया कि चूंकि बंदी सहयोग कर रहे थे, इसलिए अगली सुबह (21 अप्रैल) तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। बंदी अपने रिश्तेदारों के साथ दोपहर लगभग 12:00 बजे भोपाल स्थित साइबर सेल पहुंचे। इसके बाद राजस्थान पुलिस के अधिकारी वहां आए, और बंदी को राजस्थान पुलिस के अधिकारियों के हवाले कर दिया गया, जो उन्हें अपने साथ ले गए।
इसके बाद डिप्टी-एडवोकेट जनरल ने यह कहा कि उनके पास बंदी की हिरासत या उनकी गिरफ्तारी का कोई रिकॉर्ड नहीं भेजा गया, और न ही उन्हें राजस्थान पुलिस के हवाले किए जाने से संबंधित कोई दस्तावेज़ प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि उन्हें मिली जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश पुलिस या राजस्थान पुलिस के अधिकारियों द्वारा बंदी को पुलिस रिमांड या किसी भी प्रकार की ट्रांजिट रिमांड के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया।
22 अप्रैल को अदालत ने राजस्थान पुलिस के अधिकारियों को इस मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया था। साथ ही भोपाल के पुलिस आयुक्त को भी याचिकाकर्ताओं के आरोपों की जांच करने तथा रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। अदालत ने राजस्थान पुलिस को 27 अप्रैल को बंदी को अदालत में पेश करने का भी निर्देश दिया। मध्य प्रदेश पुलिस को भी संबंधित CCTV फुटेज पेश करने का निर्देश दिया गया।
27 अप्रैल को राजस्थान पुलिस के वकील ने यह दलील दी कि चूंकि बंदी न्यायिक हिरासत (राजस्थान में) में हैं, इसलिए उन्हें अदालत में पेश नहीं किया जा सकता। अतः अदालत ने राजस्थान राज्य को 29 अप्रैल को बंदी को अदालत में पेश करने का निर्देश दिया। साथ ही अधिकारियों को भी अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया। अदालत ने घड़ी के समय और वास्तविक समय के बीच के अंतर को समायोजित करने के बाद, संबंधित CCTV फुटेज भी तलब किया था।
बुधवार को राजस्थान पुलिस ने बताया कि संबंधित व्यक्तियों (Corpus) को हिरासत में नहीं रखा गया। उन्हें केवल 22 अप्रैल, 2026 को दोपहर 1:10, 1:20 और 1:30 बजे गिरफ्तार किया गया। उसी दिन संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। उन्हें शुरू में पुलिस हिरासत में भेजा गया। उसके बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। यह भी बताया गया कि संबंधित व्यक्तियों ने जयपुर की सक्षम अदालत में ज़मानत के लिए अर्जी दी थी और उन्हें ज़मानत मिल भी गई। हालांकि, चूंकि वे ज़मानत बांड जमा नहीं कर पाए हैं, इसलिए वे अभी भी हिरासत में हैं और रिहाई से पहले ज़मानत की शर्तों के पूरा होने का इंतज़ार कर रहे हैं।
एडिशनल एडवोकेट जनरल बी.डी. सिंह ने 28.04.2026 की तारीख वाला एक पत्र कुछ CCTV फुटेज के साथ पेश किया और यह दलील दी कि ये ही एकमात्र प्रासंगिक CCTV फुटेज हैं।
हालांकि, बंदी (Corpus) की ओर से यह दलील दी गई कि राजस्थान पुलिस और मध्य प्रदेश पुलिस, दोनों का ही पूरा बयान असल में जो घटना घटी थी, उसके बिल्कुल विपरीत है। इसलिए अदालत ने भोपाल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे तीनों व्यक्तियों के बयान अलग-अलग दर्ज करें।
चूंकि राजस्थान सरकार के वकील ने निर्देशों के आधार पर यह दलील दी कि यह पूरा मामला DIG, क्राइम, कमिश्नरेट, जयपुर और DCP क्राइम, भोपाल के बीच हुई एक मौखिक बातचीत से शुरू हुआ था, इसलिए अदालत ने इन दोनों अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अपनी पहली बातचीत से लेकर, जब तक बंदी को उनके संबंधित क्षेत्राधिकार में मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं कर दिया गया, उस पूरी अवधि के दौरान घटी घटनाओं का विस्तृत हलफनामा (Affidavit) पेश करें।
इस मामले की अगली सुनवाई 12 मई के लिए तय की गई।
Case Title: Khizar Khan v State of Madhya Pradesh WP-14955-2026, Uday Ghenghat v State of Madhya Pradesh WP/14960/2026 and Anam Ahamad v State of Madhya Pradesh WP/14961/2026