धारा 215 BNSS | न्यायालयीन कार्यवाही से जुड़े अपराधों में पुलिस सीधे FIR दर्ज नहीं कर सकती; अभियोजन की पहल न्यायालय को ही करनी होगी: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी न्यायालयीन कार्यवाही के दौरान या उससे संबंधित अपराध किए जाने का आरोप हो, तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 215 और 379 में निर्धारित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन किया जाना अनिवार्य है।
ऐसे मामलों में संबंधित न्यायालय को पहले स्वयं अपना विवेक लागू करना होगा और लिखित शिकायत किए बिना पुलिस को सीधे एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
जस्टिस विवेक जैन ने स्पष्ट किया कि
“जब अपराध न्यायालय की कार्यवाही के दौरान या उससे संबंधित रूप से किया गया हो, तो पुलिस अधिकारी धारा 215 BNSS के तहत सीधे अपराध दर्ज नहीं कर सकता। धारा 379 BNSS के अनुसार न्यायालय को पहले प्रारंभिक जांच करानी होगी और उसके बाद ही लिखित शिकायत दर्ज की जा सकती है।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि यद्यपि न्यायालय प्रारंभिक जांच के उद्देश्य से पुलिस से सहायता ले सकता है, लेकिन यह वैधानिक विवेक कि शिकायत दर्ज की जाए या नहीं, पूरी तरह से पुलिस पर नहीं छोड़ा जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कार्यवाही याचिकाकर्ताओं के पक्ष में पारित एक धनादेश (Money Decree) के निष्पादन से उत्पन्न हुई थी। डिक्री के विरुद्ध दायर प्रथम अपील लंबित रहने के दौरान, निर्णय-ऋणियों (Judgment Debtors) ने अंतरिम आदेश के अनुपालन में ₹35.25 लाख की राशि निष्पादन न्यायालय में जमा की।
निष्पादन न्यायालय ने डिक्री धारकों को सॉल्वेंट ज़मानत (Solvent Surety) प्रस्तुत करने की शर्त पर उक्त राशि निकालने की अनुमति दी।
ज़मानत जुगल किशोर नामक व्यक्ति द्वारा कृषि भूमि के संबंध में दी गई थी। बाद में यह आरोप लगाया गया कि वही भूमि लगभग 9 बार अलग-अलग मामलों में ज़मानत के रूप में दिखाई गई थी। इसके अतिरिक्त, जुगल किशोर स्वयं न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए और उन्होंने किसी भी प्रकार की ज़मानत देने से इनकार करते हुए प्रतिरूपण (Impersonation) का आरोप लगाया।
इन आरोपों के आधार पर निर्णय-ऋणियों ने BNSS की धारा 379 के तहत डिक्री धारकों एवं कथित प्रतिरूपण करने वाले ज़मानतदार के विरुद्ध विभिन्न आईपीसी धाराओं में अभियोजन की मांग करते हुए आवेदन दायर किया।
आदेश
हालांकि, निष्पादन न्यायालय ने न तो इस आवेदन पर कोई आदेश पारित किया और न ही BNSS के तहत अपेक्षित संतुष्टि दर्ज की। इसके बावजूद, न्यायालय ने पुलिस को जांच करने का निर्देश दिया और यह भी कहा कि यदि ज़मानत फर्जी पाई जाए, तो एफआईआर दर्ज कर उचित कार्रवाई की जाए।
इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या निष्पादन न्यायालय, BNSS की धारा 215 और 379 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना तथा स्वयं संतुष्टि दर्ज किए बिना, पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि BNSS की वैधानिक योजना के अनुसार न्यायालय को पहले प्रारंभिक जांच करनी होती है या करानी होती है और यह तय करना होता है कि न्याय के हित में शिकायत दर्ज करना उचित है या नहीं। यह दायित्व केवल पुलिस को सौंपा नहीं जा सकता।
वहीं, प्रतिवादियों ने गंभीर आरोपों को देखते हुए पुलिस को निर्देश देना उचित बताया।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने BNSS की धारा 215 और 379 की योजना का परीक्षण किया और कहा कि न्यायालयीन कार्यवाही से संबंधित अपराधों में संज्ञान केवल विधि द्वारा निर्धारित तरीके से ही लिया जा सकता है।
न्यायालय ने कहा कि धारा 379 BNSS के तहत संबंधित न्यायालय को प्रारंभिक जांच करानी होती है या करवानी होती है और उसके पश्चात स्वयं संतुष्टि दर्ज कर लिखित शिकायत करनी होती है।
हालांकि न्यायालय प्रारंभिक जांच के लिए पुलिस से सहायता ले सकता है, लेकिन एफआईआर दर्ज करने का विवेक पुलिस पर नहीं छोड़ा जा सकता।
न्यायालय ने कहा:
“इस मामले में न्यायालय ने न तो कोई प्रारंभिक जांच की और न ही कोई प्रथमदृष्टया संतुष्टि दर्ज की, बल्कि सीधे पुलिस को जांच कर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे दिया। यह विवेक न्यायालय द्वारा स्वयं प्रयोग किया जाना चाहिए था।”
अंतिम आदेश
इन परिस्थितियों में, हाईकोर्ट ने विवादित आदेश में संशोधन करते हुए निर्देश दिया कि:
पुलिस अधिकारी केवल जांच कर रिपोर्ट निष्पादन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
एफआईआर केवल निष्पादन न्यायालय के स्पष्ट आदेश पर ही दर्ज की जाएगी, पुलिस अपने स्तर पर स्वतः एफआईआर दर्ज नहीं करेगी।
इस संशोधन के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया गया।