"विवाह या गर्भावस्था शिक्षा में बाधा नहीं बन सकती” : एमपी हाईकोर्ट ने छात्रा को उपस्थिति में छूट देने का कॉलेज को दिया निर्देश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विवाह और गर्भावस्था किसी महिला की उच्च शिक्षा में बाधा नहीं बन सकते। अदालत ने शैक्षणिक संस्थानों को निर्देश दिया कि वे छात्राओं को मातृत्व/चाइल्ड केयर अवकाश, उपस्थिति में छूट और आवश्यक शैक्षणिक सहयोग प्रदान करें।
मध्य प्रदेश हाईको की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल शामिल थे, ने कहा कि कार्यस्थलों पर उपलब्ध मातृत्व संरक्षण का लाभ शिक्षा प्राप्त कर रही महिलाओं को भी समान रूप से मिलना चाहिए।
अदालत ने कहा—
“पढ़ाई के दौरान विवाह या गर्भावस्था उनके लिए शिक्षा पूरी करने में बाधा नहीं बननी चाहिए। इसलिए अंतिम परीक्षा में बैठने के लिए आवश्यक उपस्थिति प्रतिशत प्राप्त करने हेतु उन्हें समायोजित/सुविधा दी जानी चाहिए।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गर्भावस्था या प्रसव के बाद छात्राओं को अतिरिक्त कक्षाएं, अध्ययन सामग्री और आवश्यक अकादमिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
मामले के तथ्य
याचिकाकर्ता रुमैसा अरवा, भोपाल स्थित हकीम सैयद ज़ियाउल हसन शासकीय स्वायत्त यूनानी कॉलेज की BUMS छात्रा हैं। उन्होंने पहला वर्ष सफलतापूर्वक पूरा किया। दूसरे वर्ष में उनका विवाह हुआ और वे गर्भवती हो गईं। 20 नवंबर 2024 को उन्होंने शिशु को जन्म दिया और मातृत्व अवकाश की मांग की।
हालांकि, कॉलेज ने केवल 10% उपस्थिति में छूट दी। 75% की अनिवार्य उपस्थिति के मुकाबले उनकी उपस्थिति 56.64% होने के कारण उन्हें परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया।
इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया। याचिका लंबित रहने के दौरान अदालत ने अंतरिम आदेश देकर उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति दी, लेकिन परिणाम रोक दिया गया।
याचिकाकर्ता ने UGC के 14.10.2021 के पत्र का हवाला दिया, जिसमें सभी शिक्षण संस्थानों को छात्राओं के लिए मातृत्व/चाइल्ड केयर अवकाश नीति बनाने के निर्देश दिए गए थे। उन्होंने Delhi High Court के निर्णय Renuka बनाम UGC का भी उल्लेख किया, जिसमें मातृत्व लाभ को महिलाओं के अधिकारों का हिस्सा माना गया है।
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि न्यूनतम 75% उपस्थिति पूरी न होने के कारण याचिकाकर्ता परीक्षा के लिए अयोग्य हैं और उन्हें पहले ही 10% की छूट दी जा चुकी है।
न्यायालय की टिप्पणियां
अदालत ने पाया कि UGC के निर्देशों के बावजूद संबंधित संस्थान ने अब तक कोई मातृत्व नीति तैयार नहीं की थी। कोर्ट ने कहा कि गर्भावस्था के आधार पर शैक्षणिक प्रगति रोकना महिलाओं के शैक्षिक अधिकारों को निष्फल कर देगा।
कार्यस्थल से जुड़े न्यायशास्त्र के सिद्धांतों का विस्तार करते हुए अदालत ने माना कि वही संरक्षण शैक्षणिक संस्थानों में भी लागू होना चाहिए।
“आवश्यक होने पर गर्भावस्था या प्रसव के बाद अध्ययन सामग्री और अतिरिक्त कक्षाएं उपलब्ध कराई जाएं। जहां तक संभव हो, चाइल्ड केयर अवकाश का लाभ भी दिया जाए।”
इसे एक “विशेष मामला” बताते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता को आवश्यक 75% उपस्थिति तक छूट देने का आदेश दिया।