भर्ती परीक्षा अपडेट देखने की जिम्मेदारी अभ्यर्थी की ही: एमपी हाई कोर्ट ने मेडिकल आधार पर अनिवार्य समय-सीमा में ढील से किया इनकार

Update: 2026-01-22 11:16 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी भी भर्ती प्रक्रिया में शामिल अभ्यर्थियों की यह स्वयं की जिम्मेदारी है कि वे परीक्षा/भर्ती से जुड़ी सभी सूचनाओं, निर्देशों और अपडेट्स के लिए आधिकारिक वेबसाइट की नियमित निगरानी करें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग ई-मेल, पत्राचार या फोन कॉल के माध्यम से अलग से सूचना देने के लिए बाध्य नहीं है।

जस्टिस जय कुमार पिल्लै की एकलपीठ ने सहायक प्राध्यापक (बॉटनी) पद की अभ्यर्थी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि दस्तावेज़ सत्यापन के लिए तय कट-ऑफ तारीख अनिवार्य है और व्यक्तिगत या चिकित्सकीय कठिनाइयों के आधार पर इसमें ढील नहीं दी जा सकती।

क्या था मामला

याचिकाकर्ता, जो अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित हैं, ने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) द्वारा 30 दिसंबर 2022 को जारी विज्ञापन के तहत सहायक प्राध्यापक (बॉटनी) के 126 पदों के लिए आवेदन किया था। विज्ञापन की शर्तों के अनुसार, चयनित अभ्यर्थियों को 25 अक्टूबर 2024 तक दस्तावेज़ सत्यापन के लिए आवश्यक काग़ज़ात जमा करने थे, अन्यथा उनकी उम्मीदवारी रद्द होनी थी।

आयोग ने समय-सीमा में दो बार विस्तार किया—पहले ₹3,000 लेट फीस के साथ और बाद में ₹25,000 लेट फीस के साथ—अंतिम तिथि 11 नवंबर 2024 तय की गई। इसके बावजूद, याचिकाकर्ता ने दस्तावेज़ 25 नवंबर 2024 को भेजे, यानी अंतिम तिथि के बाद। परिणामस्वरूप उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता ने कहा कि वह मिक्स्ड कनेक्टिव टिश्यू डिज़ीज़ (MCTD) से पीड़ित थीं, जिसके कारण वह नियमित रूप से वेबसाइट नहीं देख सकीं और दस्तावेज़ समय पर जमा नहीं कर पाईं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके पास नियुक्ति के लिए सभी आवश्यक योग्यताएँ मौजूद हैं और देरी जानबूझकर नहीं थी। हाई कोर्ट ने 16 दिसंबर 2024 को अंतरिम आदेश के तहत उन्हें साक्षात्कार में भाग लेने की अनुमति दी थी, जो याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन थी।

आयोग/प्रतिवादियों की दलील

प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि पूरी चयन प्रक्रिया विज्ञापन की सख़्त शर्तों से संचालित होती है। समय-सीमा दो बार बढ़ाने के बावजूद याचिकाकर्ता ने अनुपालन नहीं किया। साथ ही, यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता 37 दिनों तक निष्क्रिय रहीं और बीमारी के कारण असमर्थता का कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।

अदालत की टिप्पणियाँ

अदालत ने कहा—

“विज्ञापन, संशोधनों, परिणामों और आगे के निर्देशों से संबंधित सभी सूचनाओं के लिए आयोग की वेबसाइट की नियमित निगरानी करना पूरी तरह अभ्यर्थी की जिम्मेदारी है। आयोग ने स्पष्ट रूप से ई-मेल/पत्राचार/फोन पर कार्रवाई की कोई बाध्यता स्वीकार नहीं की है।”

पीठ ने आगे कहा कि विज्ञापन अभ्यर्थी पर वैधानिक दायित्व बनाता है और जब कोई अभ्यर्थी चयन प्रक्रिया में “खुली आँखों से” शामिल होता है, तो वह शर्तों को पूर्णतः स्वीकार करता है। विज्ञापन की शर्तें पवित्र (sacrosanct) हैं और उन्हें न्यायिक व्याख्या से शिथिल नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी नोट किया कि परिणाम के साथ संलग्न परिशिष्ट-1 में साफ़ तौर पर लिखा है कि दस्तावेज़ जमा न करने पर उम्मीदवारी रद्द होगी।

“कट-ऑफ तारीख लचीली या विवेकाधीन नहीं है और न ही व्यक्तिगत कठिनाइयों के आधार पर बदली जा सकती है। अंतिम तिथि बीतने के बाद आयोग इस अभ्यर्थी के संबंध में functus officio हो गया।”

इसके अलावा, अदालत ने कहा कि विज्ञापन में चिकित्सकीय या व्यक्तिगत आधार पर छूट का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में,

“क़ानून में प्रावधान न होने पर न्यायालय समानता (equity) का सहारा लेकर छूट नहीं दे सकता। सार्वजनिक पदों पर भर्ती निश्चितता, पारदर्शिता और समान अवसर के सिद्धांतों से संचालित होती है। एक अभ्यर्थी को निजी आधार पर छूट देना अन्य अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव होगा।”

अंतरिम आदेश के आधार पर साक्षात्कार में भाग लेने से कोई अर्जित अधिकार नहीं बनता—यह कहते हुए पीठ ने याचिका खारिज कर दी।

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