मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने किरायेदार की बेदखली के खिलाफ दायर अपील खारिज करते हुए कहा है कि यदि मकान मालिक अपनी वास्तविक और bona fide आवश्यकता साबित कर देता है, तो उसे यह बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि उसने रहने के लिए कोई विशेष शहर क्यों चुना है।

जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की पीठ ने कहा कि मकान मालिक और उसके परिवार के सदस्य अपनी जरूरत के “best judges” हैं और उनकी पसंद को अनावश्यक रूप से चुनौती नहीं दी जा सकती।

मामला इंदौर के खजराना स्थित मकान से जुड़ा था। मकान मालिक ने अपने बड़े बेटे की पढ़ाई के लिए परिसर की आवश्यकता बताते हुए किरायेदार से मकान खाली कराने की मांग की थी। बेटा Company Secretary (CS) कोर्स कर रहा था और परिवार चाहता था कि वह इंदौर में रहकर अपनी पढ़ाई जारी रखे।

किरायेदार ने तर्क दिया कि मकान मालिक ने यह साबित नहीं किया कि बेटे को पढ़ाई के लिए इंदौर में ही रहने की आवश्यकता क्यों है। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि एक बार यह स्थापित हो जाए कि बेटा CS कोर्स कर रहा है, तो इंदौर में रहकर पढ़ाई जारी रखने का निर्णय मकान मालिक और उसके बेटे की पसंद है।

कोर्ट ने मकान मालिक के पति के इलाज की आवश्यकता को भी ध्यान में रखा। कोर्ट ने कहा कि यदि बेहतर चिकित्सा सुविधा के लिए इंदौर में रहना आवश्यक समझा जाता है, तो ऐसी आवश्यकता को भी bona fide requirement माना जा सकता है।

किरायेदार ने 2009 में हुए कथित मौखिक बिक्री समझौते का भी हवाला दिया था, लेकिन कोर्ट ने नोट किया कि उसने उस समझौते के आधार पर specific performance का मुकदमा 2026 तक भी दायर नहीं किया।

ट्रायल कोर्ट ने पहले ही किरायेदार को मकान खाली करने और ₹1.04 लाख बकाया किराया चुकाने का आदेश दिया था, जिसे प्रथम अपीलीय अदालत ने भी बरकरार रखा था।

हाईकोर्ट ने दोनों अदालतों के निष्कर्षों में कोई त्रुटि नहीं पाते हुए दूसरी अपील खारिज कर दी।

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