मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आपराधिक मामला दर्ज होने या उसके लंबित रहने के आधार पर हथियार का लाइसेंस निलंबित नहीं किया जा सकता। लाइसेंस निलंबित करने से पहले सक्षम प्राधिकारी को शस्त्र अधिनियम की धारा 17 के तहत स्वतंत्र और तर्कसंगत संतुष्टि दर्ज करनी होगी।

जस्टिस गजेंद्र सिंह की पीठ ने कहा कि लाइसेंस निलंबन का आदेश केवल किसी आपराधिक मामले के दर्ज होने, उसके लंबित रहने या हथियार के संभावित दुरुपयोग की सामान्य आशंका के आधार पर नहीं दिया जा सकता।

अदालत एक सुरक्षा गार्ड की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो मध्य प्रदेश मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड में कार्यरत है। उसने राजगढ़ कलेक्टर की 19 दिसंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत उसका हथियार लाइसेंस अनिश्चित अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया, जबकि उसके खिलाफ हथियार के दुरुपयोग का कोई आरोप नहीं था।

याचिकाकर्ता के अनुसार उसके भाई के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की अश्लील हरकत, स्वेच्छा से चोट पहुंचाने, गलत तरीके से रोकने और दंगा करने से संबंधित धाराओं में मामला दर्ज हुआ। उसके खिलाफ भी अश्लील हरकत, स्वेच्छा से चोट पहुंचाने और आपराधिक धमकी से संबंधित धाराओं में अलग मामला दर्ज किया गया।

याचिकाकर्ता पूर्व सैन्यकर्मी है और परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य है। उसका कहना था कि सुरक्षा गार्ड की नौकरी जारी रखने के लिए वैध हथियार लाइसेंस जरूरी है और लाइसेंस निलंबित होने से उसकी आजीविका प्रभावित हुई।

उसने यह भी बताया कि लाइसेंस निलंबित होने के बाद उसने अपनी इच्छा से हथियार नरसिंहगढ़ थाने में जमा किया। हथियार को किसी कथित दुरुपयोग या घटना में इस्तेमाल किए जाने के कारण पुलिस ने जब्त नहीं किया।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि शस्त्र अधिनियम की धारा 17(3)(b) के तहत लाइसेंस तभी निलंबित किया जा सकता है, जब सार्वजनिक शांति या सुरक्षा के लिए इसकी जरूरत हो। लेकिन उसके मामले में ऐसा कोई ठोस तथ्य नहीं बताया गया, जिससे यह साबित हो कि लाइसेंस जारी रहने से सार्वजनिक शांति या सुरक्षा प्रभावित होगी।

राज्य की ओर से यह स्वीकार किया गया कि याचिकाकर्ता पूर्व सैन्यकर्मी है और 10 सितंबर 2026 को उसे आपराधिक मामले में बरी कर दिया गया।

पीठ ने कहा कि मामले में मुख्य सवाल यह है कि क्या याचिकाकर्ता को हथियार रखने का अधिकार है। अदालत ने शस्त्र अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि हथियार का लाइसेंस राज्य की ओर से दिया गया विशेषाधिकार है, इसे अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि लाइसेंस निलंबित करने के लिए भी कानून में तय प्रक्रिया और संतुष्टि का पालन जरूरी है। पीठ ने कहा कि संबंधित आदेश में लाइसेंस निलंबित करने के लिए सक्षम प्राधिकारी ने कोई स्वतंत्र संतुष्टि दर्ज नहीं की थी। केवल आपराधिक मामला दर्ज होने के कारण लाइसेंस निलंबित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने माना कि लाइसेंसिंग प्राधिकारी ने शस्त्र अधिनियम की धारा 17(3) के तहत अपनी शक्ति का उचित तरीके से इस्तेमाल नहीं किया और बिना पर्याप्त विचार के आदेश पारित किया। अदालत ने निलंबन आदेश को मनमाना करार देते हुए रद्द किया।

इसके साथ ही मामले को नए सिरे से विचार के लिए राजगढ़ कलेक्टर के पास भेज दिया गया। कलेक्टर को आठ सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार नया फैसला लेने का निर्देश दिया गया।

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