मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उज्जैन नगर निगम की ओर से शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाने के लिए जारी किए गए नोटिस के खिलाफ दायर अपील का निपटारा किया। अदालत ने यह आदेश मस्जिद की अधिकृत प्रशासनिक समिति और नगर निगम के बीच हुए समझौते को ध्यान में रखते हुए दिया।

जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच मामला पहले ही समझौते से सुलझ चुका है। हालांकि समझौते की विस्तृत शर्तें अदालत के सामने उपलब्ध नहीं थीं।

मामला शाही मस्जिद वक्फ पांच मोचियान से जुड़ा था। नगर निगम ने सिंहस्थ कुंभ से पहले सड़क को 15 मीटर चौड़ा करने की योजना के तहत मस्जिद के एक हिस्से को हटाने का नोटिस जारी किया। इस नोटिस को चुनौती देते हुए दो अलग-अलग समूहों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। सिंगल जस्टिस ने दोनों याचिकाएं खारिज की थीं, जिसके बाद अपील दायर की गई।

खंडपीठ के समक्ष अपीलकर्ता के वकील ने कहा कि फिलहाल उज्जैन में काफी अव्यवस्था की स्थिति है और नगर निगम के साथ हुए समझौते को अदालत के आदेश में दर्ज किया जाना चाहिए। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि नगर निगम द्वारा स्वीकार की गई शर्तों का बाद में पालन नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर, नगर निगम की ओर से कहा गया कि सिंगल जस्टिस के आदेश के बाद अधिकृत प्रशासनिक समिति को संबंधित हिस्से को स्वयं हटाने का अवसर दिया गया। यह भी दलील दी गई कि वर्तमान अपील एक गैर-अधिकृत समूह की ओर से दायर की गई, इसलिए सुनवाई योग्य नहीं है।

नगर निगम की ओर से यह भी बताया गया कि सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत 80 से अधिक ढांचे हटाए जा चुके हैं, जिनमें अधिकांश मंदिर हैं। नगर निगम ने दावा किया कि मस्जिद के कुल क्षेत्रफल के 10 प्रतिशत से भी कम हिस्से को हटाने का प्रस्ताव है।

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने पीठ को दो वीडियो भी दिखाए। उनके अनुसार, वीडियो में प्रशासन को नगर निगम के साथ हुए समझौते के तहत मस्जिद के संबंधित ढांचे को हटाते हुए दिखाया गया।

समझौते को देखते हुए प्रतिवादियों ने अपील का निपटारा किए जाने का अनुरोध किया। हाईकोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए अपील का निपटारा किया।

हालांकि, अदालत ने नगर निगम की ओर से किए गए आश्वासनों को लेकर अपीलकर्ता की आशंका को भी ध्यान में रखा। पीठ ने स्पष्ट किया कि नगर निगम ने अपने जवाब और विवादित नोटिस में जो आश्वासन दिए हैं, वे निगम के लिए बाध्यकारी रहेंगे।

अदालत ने कहा,

“नगर निगम ने अपने जवाब और विवादित नोटिस में जो आश्वासन दिए हैं, वे निगम पर बाध्यकारी होंगे।”

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