तलाकशुदा बेटी को पारिवारिक पेंशन से वंचित करना भेदभावपूर्ण: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि तलाकशुदा बेटी को पारिवारिक पेंशन के अधिकार से बाहर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने माना कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
जस्टिस विशाल धगत की पीठ ने कहा,
“यदि तलाकशुदा बेटियों को परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं किया जाता, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा, क्योंकि अविवाहित, विवाहित और तलाकशुदा बेटी में कोई अंतर नहीं है।”
मामला ज्योति नामक महिला से जुड़ा था जो स्वर्गीय शंकर लाल की तलाकशुदा बेटी हैं। शंकर लाल गृह रक्षक विभाग में जिला कमांडेंट के पद पर कार्यरत थे और वर्ष 2001 में सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी पत्नी के निधन के बाद वर्ष 2017 में उन्होंने अपनी बेटी को पारिवारिक पेंशन के लिए नामित करने का अनुरोध किया था।
हालांकि अधिकारियों ने दिसंबर 2021 के आदेश के जरिए यह कहते हुए अनुरोध खारिज किया कि मध्य प्रदेश सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के तहत तलाकशुदा बेटी “परिवार” की परिभाषा में शामिल नहीं है।
याचिकाकर्ता की ओर से केंद्र सरकार के कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के 11 सितंबर 2013 के कार्यालय ज्ञापन का हवाला दिया गया। इसमें स्पष्ट किया गया कि आश्रित तलाकशुदा बेटियां निर्धारित शर्तों के अधीन पारिवारिक पेंशन की हकदार होंगी।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि नियम 45 के तहत याचिकाकर्ता को आश्रित नहीं पाया गया, इसलिए उसका दावा स्वीकार नहीं किया गया।
अदालत ने नियम 44 का परीक्षण करते हुए कहा कि इसमें पति-पत्नी, पुत्र, अविवाहित बेटियां, विधवा बेटियां, माता-पिता, नाबालिग भाई-बहन और विवाहित बेटियों सहित कई संबंधों को परिवार की श्रेणी में रखा गया, लेकिन तलाकशुदा बेटी का उल्लेख नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल तलाकशुदा होने के आधार पर बेटी को अलग श्रेणी में रखना उचित नहीं है। अदालत ने माना कि यदि तलाकशुदा बेटियों को इस दायरे से बाहर रखा जाता है तो यह समानता के सिद्धांत के विपरीत होगा।
अदालत ने आदेश रद्द करते हुए राज्य सरकार को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि यदि तलाकशुदा बेटी को आश्रित पाया जाता है तो उसे पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया जाए।