जर्जर मंदिर से मूर्तियां दूसरे मंदिर में स्थापित करना पुजारी का कदाचार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-07-25 09:33 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई मंदिर जर्जर और पूजा के लिए असुरक्षित हो जाए तो पूजा-अर्चना निर्बाध जारी रखने के लिए उसकी मूर्तियों को पास के किसी सुरक्षित और सक्रिय मंदिर में स्थापित करना पुजारी का कदाचार या कर्तव्य की उपेक्षा नहीं माना जा सकता।

जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की एकल पीठ ने शिवपुरी जिले के राधा गोपालजी श्रीराम जानकी मंदिर के पुजारी को पद से हटाने का आदेश रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।

अदालत ने कहा,

"जब कोई प्राचीन मंदिर पूजा के लिए असुरक्षित और अनुपयुक्त हो जाए, तब धार्मिक अनुष्ठानों को बिना बाधा जारी रखने के लिए मूर्तियों को पास के किसी कार्यरत मंदिर में स्थापित करना कदाचार नहीं, बल्कि देवता के हितों और श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं की रक्षा के प्रति पुजारी की निष्ठा और जिम्मेदारी को दर्शाता है।"

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में तत्कालीन शासक माधवराव सिंधिया ने मंदिर और उससे जुड़ी कृषि भूमि उनके पूर्वजों को प्रदान की थी। हालांकि, वर्ष 1976-77 में उनकी जानकारी के बिना राजस्व अभिलेखों में कलेक्टर का नाम मंदिर के प्रबंधक के रूप में दर्ज कर दिया गया।

बाद में कुछ स्थानीय लोगों ने शिकायत की कि पुजारियों ने मंदिर की संपत्ति का दुरुपयोग किया, अतिक्रमण होने दिया और आय का गलत इस्तेमाल किया। यह भी आरोप लगाया गया कि राधा गोपालजी का मूल मंदिर अब उस स्थान पर मौजूद नहीं है।

शिकायत के बाद उपखंड अधिकारी ने जांच कराई। जांच में पाया गया कि मूल मंदिर पूरी तरह जर्जर होकर स्वाभाविक रूप से गिर चुका था, इसलिए पूजा जारी रखने के लिए मूर्तियों को पास के दूसरे मंदिर में स्थापित किया गया।

जांच रिपोर्ट में पुजारियों के खिलाफ न तो किसी गड़बड़ी, न भूमि के दुरुपयोग और न ही धन के गबन का कोई प्रमाण मिला। इसके बाद उपखंड अधिकारी ने वर्ष 2004 में कार्यवाही समाप्त करते हुए मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए धन आवंटित करने का आदेश दिया।

इसके बावजूद कलेक्टर ने जांच रिपोर्ट को नजरअंदाज करते हुए मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्देश तो दिया, लेकिन पुजारियों को उनके पद से हटा दिया। संभागायुक्त ने भी इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

हाईकोर्ट ने कहा कि कलेक्टर ने उपखंड अधिकारी की विस्तृत जांच रिपोर्ट को खारिज करने का कोई ठोस कारण दर्ज नहीं किया।

अदालत ने यह भी पाया कि पुराने राजस्व अभिलेखों में मंदिर के देवता को भूमि का स्वामी दर्शाया गया है और केवल राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर का नाम प्रबंधक के रूप में दर्ज होने से राज्य को संपत्ति का स्वामित्व नहीं मिल जाता।

अदालत ने कहा कि स्थानीय शिकायतों के आधार पर वर्षों से मंदिर का प्रबंधन कर रहे पुजारियों को तब तक नहीं हटाया जा सकता, जब तक आरोप विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित न हों।

इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने कलेक्टर के आदेश को मनमाना और कानून के विपरीत बताते हुए रद्द किया तथा याचिका स्वीकार कर ली।

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