980 के संदेह पर 2.5 करोड़ का पूरा बैंक अकाउंट फ्रीज करना उचित नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जारी किए अहम दिशा-निर्देश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी के मामलों में बैंक अकाउंट फ्रीज करने की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी अकाउंट में संदिग्ध राशि बहुत कम है तो पूरे अकाउंट को फ्रीज करना उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि 980 की संदिग्ध राशि के आधार पर 2.5 करोड़ से अधिक की वैध धनराशि वाले पूरे बैंक अकाउंट को फ्रीज करना "अनुपातिकता के सिद्धांत" की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
जस्टिस हिमांशु जोशी की एकल पीठ ने कहा कि जांच एजेंसियों के वैधानिक अधिकारों और नागरिक के व्यापार करने के अधिकार तथा संपत्ति के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
अदालत ने कहा,
"पुलिस को जांच के दौरान बैंक अकाउंट के संचालन पर रोक लगाने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का प्रयोग उचित, संतुलित और केवल उतनी सीमा तक होना चाहिए, जितना संदिग्ध अपराध से जुड़ी राशि को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक हो। केवल नगण्य संदिग्ध राशि के आधार पर वैध धनराशि वाले पूरे अकाउंट को फ्रीज करना गंभीर जांच का विषय है और इसे अनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना होगा।"
मामला एक शराब कारोबारी से जुड़ा है, जिसके पास सात संयुक्त शराब दुकानों के संचालन का लाइसेंस है। याचिकाकर्ता का कहना था कि अप्रैल 2026 में बैंक ने बिना कोई कारण बताए और बिना पूर्व सूचना उसके बिजनेस अकाउंट को फ्रीज कर दिया। बाद में बैंक ने बताया कि यह कार्रवाई 10 अप्रैल 2026 को थाना प्रभारी द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 106 के तहत जारी नोटिस के आधार पर की गई थी।
याचिकाकर्ता ने बताया कि उसके अकाउंट में केवल 980 की राशि को संदिग्ध बताया गया, जबकि अकाउंट में 2.5 करोड़ से अधिक की राशि थी। इसी खाते से सातों दुकानों का संचालन, लाइसेंस शुल्क और आबकारी विभाग को भुगतान किया जाता था। अकाउंट फ्रीज होने से उसका कारोबार पूरी तरह प्रभावित हो गया।
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि कार्रवाई हिमाचल प्रदेश में दर्ज साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी सूचना के आधार पर की गई। राज्य ने तर्क दिया कि केवल संदिग्ध राशि कम होने के आधार पर अकाउंट को मुक्त नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने गृह मंत्रालय द्वारा 10 अप्रैल 2026 को जारी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का उल्लेख करते हुए कहा कि देशभर में ऐसे अनेक मामले सामने आ रहे हैं, जहां बेहद कम संदिग्ध राशि के बावजूद पूरे बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिए जाते हैं। वहीं जांच एजेंसियों का दायित्व है कि वे साइबर अपराध से जुड़ी राशि को सुरक्षित रखें। इसलिए नागरिक के व्यापार करने के अधिकार, संपत्ति के अधिकार और जांच एजेंसियों के अधिकारों के बीच संतुलन आवश्यक है।
अदालत ने यह भी कहा कि बैंक केवल जांच एजेंसी का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। खाताधारक को यह बताया जाना चाहिए कि अकाउंट किसके आदेश पर फ्रीज किया गया, शिकायत कैसे दर्ज की जा सकती है और उपलब्ध शिकायत निवारण व्यवस्था में उसकी सहायता भी बैंक की जिम्मेदारी है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पूरे बैंक अकाउंट को फ्रीज करना केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। सामान्य स्थिति में केवल विवादित या संदिग्ध राशि पर ही रोक लगाई जाए। जांच अधिकारी खाताधारक की शिकायत पर 15 दिनों के भीतर निर्णय लें और यदि शिकायत सही पाई जाए तो बैंक को तुरंत अकाउंट से रोक हटाने के निर्देश जारी करें।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर अकाउंट को अनिश्चितकाल तक फ्रीज नहीं रखा जा सकता और जहां कम कठोर उपाय उपलब्ध हों, वहां वैध कारोबारी गतिविधियों को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
साथ ही अदालत ने कहा कि यदि 90 दिनों तक सक्षम प्राधिकारी का कोई वैध आदेश नहीं आता और शिकायत का समाधान नहीं होता, तो बैंक जांच एजेंसी को 15 दिन पहले सूचना देकर अकाउंट से रोक हटा देगा। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्यतः खाताधारक शिकायत निवारण प्रक्रिया पूरी होने और 90 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद ही अकाउंट को मुक्त कराने के लिए रिट याचिका दायर करेगा।
अंत में हाईकोर्ट ने संबंधित थाना प्रभारी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के आवेदन पर गृह मंत्रालय की SOP और अदालत द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप निर्णय लें।