भोजशाला विवाद: 1935 में नमाज की अनुमति देने का अधिकार धार रियासत को था: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में हस्तक्षेपकर्ता की दलील; फैसला सुरक्षित

Update: 2026-05-13 10:19 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान हस्तक्षेपकर्ता ने दलील दी कि वर्ष 1935 में धार रियासत सक्षम प्राधिकारी थी, इसलिए मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति देने वाली व्यवस्था वैध मानी जानी चाहिए।

यह दलील केंद्र सरकार के उस तर्क के जवाब में दी गई, जिसमें कहा गया कि धार रियासत द्वारा 1935 में जारी अधिसूचना, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को विवादित स्थल पर नमाज का अधिकार दिया गया था कानूनी रूप से वैध नहीं थी।

भोजशाला 11वीं शताब्दी का एक संरक्षित स्मारक है, जिसकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती यानी वाग्देवी का मंदिर मानता है जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।

वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा बनाई गई व्यवस्था के तहत मंगलवार को हिंदू समुदाय पूजा करता है, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज अदा करता है।

मामले में दायर जनहित याचिका में विवादित स्थल का वैज्ञानिक सर्वे कराने और हिंदू समुदाय की ओर से स्थल को वापस दिलाने की मांग की गई। साथ ही परिसर में नमाज पर रोक लगाने की भी मांग की गई।

इसी मामले में हाईकोर्ट ने पहले सर्वे का आदेश दिया था, जिसे मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे की अनुमति देते हुए हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि सर्वे रिपोर्ट खोली जाए, पक्षकारों को उसकी प्रतियां दी जाएं और अंतिम सुनवाई में उनकी आपत्तियों पर विचार किया जाए।

हालिया सुनवाई में हस्तक्षेपकर्ता ने कहा कि 1935 की व्यवस्था आज भी प्रभावी है और केवल इसलिए समाप्त नहीं मानी जा सकती, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार अधिनियम, 1935 निरस्त हो गया।

हस्तक्षेपकर्ता के वकील ने कहा,

“उस समय धार रियासत एक सक्षम प्राधिकारी थी। उसके पास अपना प्रशासन, मंत्रालय, अधिकार क्षेत्र और आधिकारिक मुहर थी। इसलिए उसे ऐसा आदेश जारी करने का अधिकार था।”

उन्होंने आगे तर्क दिया कि संविधान का अनुच्छेद 395 भले ही भारत सरकार अधिनियम, 1935 को निरस्त करता है, लेकिन उससे पहले लागू कानून, आदेश या प्रशासनिक व्यवस्थाएं स्वतः समाप्त नहीं हो जातीं।

वकील ने अदालत से कहा कि अब तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राज्य सरकार या याचिकाकर्ताओं की ओर से ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो कि 1935 की अधिसूचना को कभी रद्द किया गया।

उन्होंने कहा,

“आज तक कोई दस्तावेज दाखिल नहीं किया गया कि 1935 की यह अधिसूचना रद्द हुई। उसकी वैधानिक मान्यता अब भी कायम है।”

पिछली सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से काजी जकाउल्लाह ने तर्क दिया कि विवादित स्थल पर मंदिर होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।

वहीं जैन समुदाय जो इस मामले में याचिकाकर्ता भी है, ने दावा किया कि विवादित ढांचे की वास्तुकला माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिरों से मिलती-जुलती है।

हिंदू पक्ष की ओर से पेश याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी ने अदालत में कहा कि स्थल से मिले शिलालेख स्पष्ट रूप से मंदिर के अवशेष होने की पुष्टि करते हैं।

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