दूसरे राज्य में जाने पर स्वतः नहीं मिलेगा अनुसूचित जाति का लाभ, भले वही जाति वहां भी सूचीबद्ध हो: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-05-06 11:50 GMT

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि कोई व्यक्ति यदि एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरित होता है तो वह अपने साथ अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं ले जा सकता, भले ही उसकी जाति दोनों राज्यों में अनुसूचित जाति के रूप में मान्य हो।

जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की पीठ ने कहा कि किसी जाति को किसी विशेष राज्य में अनुसूचित जाति का दर्जा वहां की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर दिया जाता है जो दूसरे राज्य में समान हो यह आवश्यक नहीं है।

अदालत ने कहा,

“एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाला व्यक्ति अपना जातिगत दर्जा नए राज्य में साथ लेकर नहीं जाता, भले ही वही जाति वहां भी अनुसूचित जाति के रूप में मान्य हो।”

मामला आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के पद पर नियुक्ति से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जाति वर्ग के तहत आवेदन किया। याचिकाकर्ता का दावा था कि उसके पास वैध अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र है, जो पूरे भारत में मान्य है इसलिए उसे आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की।

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की पहचान राज्य-विशिष्ट होती है। किसी राज्य में मान्यता प्राप्त जाति को दूसरे राज्य में स्वतः वही लाभ नहीं मिल सकता।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय मर्री चंद्रशेखर राव बनाम डीन, सेठ जी.एस. मेडिकल कॉलेज का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जाति की पहचान स्थानीय परिस्थितियों और क्षेत्रीय पिछड़ेपन पर आधारित होती है।

मामले में अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता विवाह के बाद राजस्थान से मध्यप्रदेश आई थी और उसके पास राजस्थान द्वारा जारी अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र था। इसलिए वह मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति आरक्षण का लाभ पाने की पात्र नहीं है।

हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति प्रक्रिया केवल मेरिट के आधार पर पूरी की जाए और याचिकाकर्ता को अनुसूचित जाति आरक्षण का लाभ न दिया जाए।

अदालत ने यह प्रक्रिया तीन माह के भीतर पूरी करने का निर्देश देते हुए याचिका खारिज की।

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