श्योपुर नगर पालिका अध्यक्ष चुनाव मामला फिर खुला: हाईकोर्ट ने सरकार को फटकारा, कहा- विरोधाभासी रुख अपनाकर प्रक्रिया में देरी की

Update: 2026-05-27 10:04 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने श्योपुर नगर पालिका परिषद अध्यक्ष चुनाव को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका को फिर से बहाल किया।

अदालत ने राज्य सरकार और निर्वाचित अध्यक्ष रेणु गर्ग के विरोधाभासी रुख पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि दोनों ने अलग-अलग मंचों पर अलग दलीलें देकर न्यायिक प्रक्रिया में देरी की।

जस्टिस आशीष श्रोती की पीठ ने प्रथम जिला जज के उस आदेश रद्द किया, जिसमें चुनाव याचिका समयपूर्व बताते हुए खारिज की गई।

श्योपुर नगर पालिका परिषद के चुनाव जुलाई 2022 में हुए थे जिनमें 23 पार्षद चुने गए। इसके बाद 5 अगस्त 2022 को पहली बैठक में रेणु गर्ग नगर पालिका अध्यक्ष निर्वाचित हुईं।

इस चुनाव को सुमेर सिंह ने मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1961 के तहत चुनाव याचिका दायर कर चुनौती दी थी। लेकिन चुनाव न्यायाधिकरण ने 1 फरवरी 2024 को यह कहते हुए याचिका खारिज की कि अध्यक्ष के चुनाव की राजपत्र अधिसूचना प्रकाशित नहीं हुई और याचिकाकर्ता ने 200 रुपये की ट्रेजरी रसीद भी जमा नहीं की थी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार और रेणु गर्ग ने अदालतों के सामने अलग-अलग तर्क रखे। चुनाव न्यायाधिकरण के सामने उन्होंने कहा था कि राजपत्र में प्रकाशन आवश्यक है, जबकि हाइकोर्ट में दलील दी कि 2020 संशोधन के बाद ऐसी अधिसूचना की जरूरत ही नहीं रही।

इस पर अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,

“गैर-आवेदकों ने जिस आधार पर याचिका की ग्राह्यता पर आपत्ति उठाई, उसी पर वे स्वयं निश्चित नहीं हैं।”

हाईकोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि यदि राज्य सरकार के अनुसार राजपत्र अधिसूचना जरूरी ही नहीं थी, तो फिर रेणु गर्ग किस कानूनी आधार पर अध्यक्ष पद पर कार्य करती रहीं।

अदालत ने 8 अक्टूबर 2025 को रेणु गर्ग को अध्यक्ष के रूप में काम करने से रोक दिया था। इस आदेश को खंडपीठ और बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन दोनों जगह राहत नहीं मिली।

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार के रवैये पर भी कड़ी टिप्पणी की।

जस्टिस श्रोती ने कहा कि बार-बार स्थगन मांगना “बेंच हंटिंग” जैसा प्रतीत होता है। अदालत ने सरकार के आचरण पर असंतोष जताते हुए इसे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास बताया।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बचाने के लिए अधीनस्थ अधिकारियों को बलि का बकरा बना रही है।

अदालत ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे व्यक्तिगत रूप से जांच कर पता लगाएं कि चुनाव न्यायाधिकरण में विरोधाभासी आपत्तियां दाखिल करने की अनुमति किसने दी थी।

मामले की सुनवाई में अदालत ने 2020 संशोधन और बाद में 2023 में किए गए संशोधन का भी विश्लेषण किया। अदालत ने माना कि कानून में गंभीर विसंगति थी, क्योंकि अध्यक्ष चुनाव की राजपत्र अधिसूचना का प्रावधान नहीं था, लेकिन चुनाव याचिका दाखिल करने की समयसीमा उसी अधिसूचना से जुड़ी हुई थी।

हाईकोर्ट ने “सामंजस्यपूर्ण व्याख्या” के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि अध्यक्ष चुनाव की प्रक्रिया 5 अगस्त 2022 को पूरी हो गई और उसी दिन से चुनौती देने का अधिकार उत्पन्न हुआ। चूंकि चुनाव याचिका 23 अगस्त 2022 को दाखिल की गई, इसलिए वह समयसीमा के भीतर थी।

अदालत ने चुनाव न्यायाधिकरण को निर्देश दिया कि वह नवंबर 2026 तक मामले का निपटारा करे। साथ ही 200 रुपये की ट्रेजरी रसीद से जुड़ी आपत्ति पर अंतिम सुनवाई के दौरान साक्ष्यों के आधार पर फैसला करने को कहा।

हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के लिए रेणु गर्ग पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

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