दो साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या में मौत की सजा उम्रकैद में बदली, एमपी हाईकोर्ट ने कहा- मामला रेयरेस्ट ऑफ रेयर नहीं
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दो साल की बच्ची से गंभीर यौन हमला और हत्या के दोषी व्यक्ति की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। अदालत ने कहा कि आरोपी के सुधार और पुनर्वास की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने उसे कम से कम 25 वर्ष की वास्तविक उम्रकैद की सजा दी है, जिसमें कोई छूट नहीं मिलेगी।
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की बेंच ने कहा कि मानव जीवन ईश्वर का अनमोल उपहार है और किसी व्यक्ति का जीवन आसानी से नहीं छीना जाना चाहिए। अदालत ने आरोपी की उम्र, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं होना, जेल में उसका आचरण और भविष्य में सुधार की संभावना समेत कई परिस्थितियों को सजा तय करते समय महत्वपूर्ण माना।
मामला विशेष पॉक्सो कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर तीन आपराधिक अपीलों और आपराधिक संदर्भ से जुड़ा था, जिसमें आरोपी को हत्या, साक्ष्य मिटाने, आपराधिक धमकी और POCSO Act के तहत गंभीर प्रवेशनात्मक यौन हमले का दोषी ठहराकर मौत की सजा दी गई। दो अन्य आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 506 के तहत दोषी ठहराया गया।
अभियोजन के अनुसार, पीड़िता की मां के बयान पर दर्ज FIR में आरोप लगाया गया कि आरोपी उसी घर में रह रहा था और उसने बच्ची के साथ वारदात की। घटना के समय बच्ची की मां आरोपी की पत्नी के साथ शादी समारोह में गई। वापस लौटने पर उसने बच्ची को बेहोशी की हालत में पाया। बच्ची के नाक, गले और गाल पर चोट के निशान थे।
मां ने जब आरोपी से इस बारे में पूछा तो वह नशे में था। उसने कथित तौर पर कहा कि बच्ची रो रही थी, इसलिए उसने उसे थप्पड़ मारा था और सुलाना चाहता था। उसने मामले की शिकायत करने पर धमकी भी दी। इसके बाद बच्ची को अस्पताल ले जाया गया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्ची की खोपड़ी में फ्रैक्चर तथा योनि और गुदा में चोटें पाई गईं। रिपोर्ट के मुताबिक जबरन यौन प्रवेश और सिर तथा चेहरे पर लगी चोटों के कारण बच्ची की मौत हुई।
आरोपी को 8 मार्च 2023 को गिरफ्तार किया गया। जांच के दौरान चादर और बच्ची के कपड़ों समेत अन्य सामग्री जब्त की गई। साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर विचार करने के बाद ट्रायल कोर्ट ने मामले को 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' मानते हुए मौत की सजा सुनाई थी।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन के साक्ष्यों में कई विरोधाभास हैं। अंतिम बार साथ देखे जाने के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा गया कि अधिकतम उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 506 और 201 के तहत ही दोषी ठहराया जा सकता है।
हालांकि हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य IPC की धारा 302, 201 और 506 के भाग दो तथा POCSO Act की धारा 5(एम) के तहत दोषसिद्धि कायम रखने के लिए पर्याप्त हैं।
इसके बाद बेंच ने मौत की सजा के सवाल पर अपराध की गंभीरता के साथ आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों की भी जांच की। अदालत ने माना कि बच्ची के साथ गंभीर प्रवेशनात्मक यौन हमला साबित हुआ है, लेकिन मौत की सजा के लिए केवल अपराध की गंभीरता ही पर्याप्त नहीं है। दोषी के सुधार की संभावना और अन्य कम करने वाली परिस्थितियों को भी देखना जरूरी है।
बेंच ने पाया कि आरोपी की उम्र 32 वर्ष है और उसका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वह ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आता है। जेल रिपोर्ट में उसका आचरण सामान्य पाया गया और उसके खिलाफ अनुशासनहीनता की कोई घटना दर्ज नहीं थी। अदालत ने उसकी आर्थिक अस्थिरता और जेल में उसके व्यवहार को भी ध्यान में रखा।
अदालत ने यह भी देखा कि दूसरी जाति में विवाह करने के कारण आरोपी को सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ा था। उसके परिवार में पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं, जो उस पर निर्भर हैं। इसके अलावा ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो कि आरोपी पेशेवर या आदतन अपराधी है अथवा समाज के लिए लगातार खतरा बना हुआ है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी को समाज के लिए ऐसा खतरा नहीं माना जा सकता, जिसके लिए 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' श्रेणी की सजा जरूरी हो। अदालत ने उसकी मौत की सजा को कम-से-कम 25 वर्ष की उम्रकैद में बदल दिया और स्पष्ट किया कि इस अवधि में कोई छूट नहीं दी जाएगी।
इस तरह हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से मंजूर करते हुए दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।
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