अच्छी अदालत की पहली जरूरत अच्छा बार, वकील जज को वह दिखा सकता है जो शायद छूट जाए: चीफ जस्टिस अल्पेश कोगजे
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के नवनियुक्त चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे ने अपने स्वागत समारोह में स्वतंत्र और मजबूत बार को बेहतर न्याय व्यवस्था की पहली शर्त बताया। उन्होंने कहा कि एक जज के पास ज्ञान, अनुभव और अच्छे संस्थान का समर्थन हो सकता है, लेकिन एक अच्छा वकील जज को वह पक्ष दिखा सकता है, जो अन्यथा उसकी नजर से छूट जाता। यही प्रतिद्वंद्वी न्याय प्रणाली की खूबसूरती है वकील अपनी दलील रखता है और जज उसे सुनता है।
चीफ जस्टिस कोगजे ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट आना उनके लिए सम्मान और विशेषाधिकार का विषय है लेकिन इसके साथ बड़ी जिम्मेदारी और कृतज्ञता भी जुड़ी है। वर्ष 1993 में वकालत शुरू करने और 2016 में हाईकोर्ट की पीठ पर आने का उल्लेख करते हुए उन्होंने बार से बेंच तक के अपने सफर को भी याद किया। उन्होंने कहा कि बार में रहते हुए वकील मामले को एक पक्ष से देखता है, लेकिन बेंच पर आने के बाद जज की जिम्मेदारी होती है कि वह हर पक्ष से न्याय को देखे।
मध्य प्रदेश में अपनी नई भूमिका का जिक्र करते हुए चीफ जस्टिस ने नर्मदा नदी को गुजरात और मध्य प्रदेश के बीच अनुभव और संस्थागत सीख के प्रवाह का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि गुजरात की यादें और वहां मिले स्नेह को वह अपने साथ लेकर आए हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में उन्हें एक नई शुरुआत करनी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह मध्य प्रदेश को अपने अनुसार ढालने की अपेक्षा नहीं रखते, बल्कि उन्हें खुद मध्य प्रदेश के अनुरूप ढलना होगा। उनके मुताबिक हर हाईकोर्ट की अपनी परंपराएं, कार्यशैली, बार और संस्थागत स्मृतियां होती हैं, जिन्हें वह समझना चाहते हैं।
चीफ जस्टिस कोगजे ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की न्यायिक विरासत का भी उल्लेख किया और पूर्व चीफ जस्टिस एम. हिदायतुल्लाह के साथ जस्टिस जे.एस. वर्मा, जी.पी. सिंह और आर.सी. लाहोटी जैसे दिग्गजों को याद किया। उन्होंने कहा कि इन न्यायविदों की विद्वता, ईमानदारी, साहस और दूरदृष्टि ने भारतीय न्यायशास्त्र को महत्वपूर्ण रूप से समृद्ध किया।
उन्होंने बार की स्वतंत्रता और निर्भीक वकालत पर भी जोर दिया। चीफ जस्टिस ने कहा कि वकील को सम्मानपूर्वक और निर्भीकता से अदालत को यह बताने में सक्षम होना चाहिए कि उसके अनुसार अदालत का दृष्टिकोण गलत है। वहीं जज में इतनी परिपक्वता होनी चाहिए कि वह ऐसी आलोचना को व्यक्तिगत तौर पर न ले। उन्होंने कहा कि बार को भी यह समझना होगा कि जज का संवैधानिक दायित्व कभी-कभी उसे वकील से यह कहने के लिए मजबूर कर सकता है कि अदालत उसकी दलील से सहमत नहीं है। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक-दूसरे के प्रति सम्मान कभी खत्म नहीं होना चाहिए। शिष्टाचार और साहस एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
चीफ जस्टिस ने न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में मुकदमेबाज को रखने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अदालतों में रोजाना सैकड़ों मामलों की सुनवाई के बीच कोई मुकदमा महज बोर्ड पर दर्ज एक संख्या बन सकता है, लेकिन उस संख्या के पीछे एक इंसानी कहानी होती है। उन्होंने कहा कि पूरी न्याय व्यवस्था में एक व्यक्ति को कभी नहीं भुलाया जा सकता और वह मुकदमेबाज है।
उन्होंने न्यायिक कार्यवाही में तेजी और दक्षता की जरूरत स्वीकार करते हुए कहा कि दोनों का उद्देश्य न्यायपूर्ण सुनवाई की कीमत पर हासिल नहीं किया जाना चाहिए। तकनीक के इस्तेमाल की वकालत करते हुए उन्होंने चेताया कि तकनीक न्याय को इतना जटिल या अमानवीय न बना दे कि आम व्यक्ति उससे दूर हो जाए। उनके मुताबिक दक्षता जरूरी है लेकिन सुनवाई की कीमत पर नहीं तकनीक को अपनाना चाहिए लेकिन न्याय को मानवीय स्वरूप से अलग नहीं होने देना चाहिए क्योंकि आखिरकार न्याय इंसानों द्वारा इंसानों को दिया जाता है।
साथी जजों को संबोधित करते हुए चीफ जस्टिस कोगजे ने कहा कि चीफ जस्टिस के पास प्रशासनिक जिम्मेदारियां जरूर होती हैं, लेकिन हाईकोर्ट का प्रत्येक जज स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकारी है। उन्होंने खुद को अपने किसी सहकर्मी से ऊपर मानने से इनकार करते हुए कहा कि चीफ जस्टिस समान लोगों में प्रथम हैं। उन्होंने साथी जजों से सहयोग, अनुभव और जरूरत पड़ने पर आलोचना की भी अपेक्षा जताई।
उन्होंने कहा कि उनका प्रयास रहेगा कि प्रत्येक जज को स्वतंत्रता, गरिमा और आत्मविश्वास के साथ काम करने का माहौल मिले। साथ ही उन्होंने रजिस्ट्री और कोर्ट स्टाफ की भूमिका को भी न्याय व्यवस्था का अहम हिस्सा बताया। उनके मुताबिक न्याय केवल उस समय नहीं होता जब जज आदेश सुनाता है बल्कि इसके पीछे रजिस्ट्री, कोर्ट स्टाफ, प्रशासनिक अधिकारी, वकील और जजों का सामूहिक प्रयास होता है।
युवा वकीलों को संबोधित करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि कानूनी करियर एक दिन में नहीं बनता और न ही केवल मुकदमे जीतने से बनता है। उन्होंने अपने युवा वकालत के दिनों को याद करते हुए कहा कि हर युवा वकील महत्वाकांक्षा के साथ पेशे में आता है लेकिन समय के साथ उसे समझ में आता है कि कानूनी पेशे में सफलता लगातार सीखने और काम करने से हासिल होती है।
अपने भाषण के अंत में उन्होंने फिर नर्मदा नदी का उदाहरण देते हुए कहा कि नदी यह नहीं पूछती कि वह कहां से शुरू हुई है, बल्कि वह बहती है, लोगों को जोड़ती है, जीवन देती है और अपने पीछे खुद से बड़ी विरासत छोड़ जाती है। उन्होंने बार, बेंच और रजिस्ट्री से मिलकर काम करने का आह्वान करते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य आम नागरिक का कानून की गरिमा और न्याय के वादे पर विश्वास बनाए रखना होना चाहिए।