दिल्ली हाईकोर्ट ने नर्सरी स्कूल के लिए तय ज़मीन पर बने मंदिर को रेगुलर करने की मांग वाली याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा कि मंदिर बिना मंज़ूरी के और सरकारी ज़मीन के निपटारे से जुड़े नियमों के खिलाफ बनाया गया।

जस्टिस जसमीत सिंह ने कहा कि मंदिर "साफ़ तौर पर एक अवैध ढांचा" था और इसे उस ज़मीन पर बने रहने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।

याचिकाकर्ता रजिस्टर्ड सोसाइटी है। उसने कोर्ट से DDA के 2021 का फैसला रद्द करने और वहां बने मंदिर को रेगुलर करने की मांग की थी।

कोर्ट ने पाया कि यह ज़मीन मूल रूप से नर्सरी स्कूल के लिए तय की ग। अमेरिकन एम्बेसी एम्प्लॉइज कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी, जो उस इलाके का विकास कर रही थी, उसने बाद में मंदिर बनाने के लिए ज़मीन के अलॉटमेंट की मांग थी। DDA ने 1987 में सोसाइटी से एक अलग धार्मिक सोसाइटी बनाने और अलॉटमेंट के लिए आवेदन करने को कहा।

इसके बाद याचिकाकर्ता-सोसाइटी का गठन किया गया। हालांकि, फैसले के अनुसार, इसने 1991-92 में बिना ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव या DDA से मंज़ूरी लिए अवैध रूप से मंदिर का निर्माण किया।

याचिकाकर्ता ने DDA के 2016 के उस फैसले का हवाला दिया, जिसमें मंदिर बनाने के लिए प्लॉट के अलॉटमेंट को मंज़ूरी दी गई। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि दिसंबर 2017 में डिवीज़न बेंच ने DDA को अलॉटमेंट पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।

इसके बाद DDA ने मामले पर विचार किया और निष्कर्ष निकाला कि सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक श्रेणियों के लिए सरकारी ज़मीन का निपटारा नीलामी के ज़रिए किया जाना चाहिए और अनधिकृत कब्ज़े को रेगुलर करने के अनुरोध पर विचार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि लागू नज़ूल (सरकारी) ज़मीन के नियम धार्मिक उद्देश्यों के लिए ज़मीन के अलॉटमेंट की इजाज़त देते हैं और कहा कि मंदिर को रेगुलर किया जाना चाहिए।

हालांकि, DDA ने कहा कि 2021 की अधिसूचना के बाद उसने राजस्व बढ़ाने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक-सांस्कृतिक और खेल सुविधाओं के लिए ज़मीन की नीलामी की नीति अपनाई है। उसने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ऐसी नीलामी में भाग ले सकता है और मंदिर चलाने के लिए भी ज़मीन की बोली लगा सकता है। इसे देखते हुए कोर्ट ने कहा कि मंदिर को उस जगह पर बने रहने की इजाज़त नहीं दी जा सकती और याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे पूरी श्रद्धा और रीति-रिवाज़ों के साथ मूर्तियाँ हटा लें।

Case title: Sanmati Sabha (Regd.) v. Delhi Development Authority & Ors.

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