नाबालिगों को गाड़ी के बोनट से बांधकर घुमाने का मामला: पुणे पुलिस कमिश्नर के खिलाफ FIR की मांग
महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने पुणे में तीन नाबालिग लड़कों को पुलिस वाहन के बोनट से बांधकर सड़कों पर घुमाने और उनके साथ मारपीट किए जाने के मामले में पुणे पुलिस कमिश्नर समेत कई पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की सिफारिश की।
आयोग ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि मामले की जांच तेजी से पूरी कराई जाए और जांच ऐसे अधिकारी को सौंपी जाए, जो अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक या उससे ऊपर के पद का हो।
मामला पुणे के भारती विद्यापीठ थाना क्षेत्र का है। 21 जुलाई को एक युवक की हत्या के मामले में पुलिस ने चार लड़कों को पकड़ा था। इनमें से तीन नाबालिगों को पुलिस वाहन के बोनट से बांधकर सार्वजनिक रूप से सड़कों पर घुमाया गया। इस दौरान निजी लोगों ने भी उनके साथ लाठी-डंडों और मुक्कों से मारपीट की। घटना के वीडियो सामने आने के बाद मामला गंभीर रूप से तूल पकड़ गया।
महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने 3 अगस्त को इस घटना का स्वत: संज्ञान लिया और पूरे मामले की तथ्यात्मक जांच के आदेश दिए। जांच में सामने आया कि पुणे पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार को 21 जुलाई को ही घटना की जानकारी मिल गई। वीडियो सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित होने के बाद उन्हें पूरे घटनाक्रम का पता चला, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कथित तौर पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ तत्काल कोई कार्रवाई नहीं की।
जांच में यह भी सामने आया कि नाबालिगों की हिरासत किशोर न्याय बोर्ड को सौंपने के बजाय उन्हें पुलिस के कब्जे में रखा गया। आयोग के आदेश के बाद ही संबंधित पुलिस अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। इस बीच पुलिस हिरासत में रखे गए शुरुआती लड़कों के साथ कथित तौर पर मारपीट की गई और इसी हत्या के मामले में चार और नाबालिगों को पकड़कर हिरासत में रखा गया।
आयोग की पूरी पीठ, जिसकी अध्यक्षता रिटायर जज जस्टिस अनंत बदर ने की, उन्होंने कहा कि तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट से बच्चों के खिलाफ पुलिस की ओर से संज्ञेय अपराध किए जाने के प्रथम दृष्टया संकेत मिलते हैं। ऐसे में कानून के शासन की रक्षा करना आयोग का दायित्व है और मामले में तत्काल जरूरी कार्रवाई की जानी चाहिए।
आयोग ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक को जांच रिपोर्ट भेजते हुए सिफारिश की कि तथ्यात्मक जांच की रिपोर्ट को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173 के तहत एफआईआर माना जाए और उसके आधार पर आगे की जांच की जाए। आयोग ने यह भी कहा कि चूंकि आरोप मौजूदा पुणे पुलिस कमिश्नर के खिलाफ भी हैं और वह अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी हैं, इसलिए जांच उनसे कनिष्ठ अधिकारी को नहीं सौंपी जानी चाहिए।
आयोग ने पुलिस महानिदेशक को जांच अधिकारी अपनी पसंद से नियुक्त करने की छूट भी दी। साथ ही स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी केवल आयोग की तथ्यात्मक जांच में सामने आए मामलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जांच के दौरान सामने आने वाले अन्य संबंधित अपराधों की भी पेशेवर तरीके से जांच कर सकेगा।
आयोग की पीठ में अध्यक्ष रिटायर जज जस्टिस अनंत बदर के साथ सदस्य रिटायर जज जस्टिस स्वप्ना जोशी और संजय कुमार भी शामिल थे। पीठ ने पुणे पुलिस कमिश्नर की ओर से दाखिल हलफनामे का भी उल्लेख किया।
इसमें कहा गया कि उन्हें 21 जुलाई को ही पूरी घटना की जानकारी हो गई, लेकिन भारती विद्यापीठ थाने के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक मानसिंह पाटील और सहायक पुलिस निरीक्षक गणेश मोहिते के तबादले का आदेश क्रमश: 5 अगस्त और 12 अगस्त को जारी किया गया। इसी दौरान दोनों अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस भी दिए गए।
इन नोटिसों में कथित तौर पर नाबालिगों के साथ क्रूरता करने, उन्हें गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने और निर्धारित समय से अधिक समय तक थाने में रखने जैसे कदाचार का उल्लेख किया गया। लेकिन आयोग ने इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई कि पुलिस कमिश्नर ने अपने हलफनामे और नोटिस में किशोर न्याय कानून के तहत संरक्षण प्राप्त बच्चों के लिए 'आरोपी' शब्द का इस्तेमाल किया।
आयोग ने कहा कि किशोर न्याय कानून के तहत कानून के साथ संघर्ष की स्थिति में आए बच्चों के साथ सामान्य अपराधियों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता। आयोग के अनुसार पुलिस कमिश्नर के हलफनामे से यह स्पष्ट होता है कि उन्हें 21 जुलाई को ही बच्चों को पकड़ने और पुलिस वाहन से बांधकर सार्वजनिक रूप से घुमाए जाने की जानकारी थी। इसके बावजूद आठों बच्चों को 24 जुलाई की देर रात तक कथित रूप से गलत तरीके से हिरासत में रखा गया और उन्हें किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश नहीं किया गया।
आयोग ने कहा कि पुलिस अधिकारियों की ओर से बच्चों के साथ इस तरह का व्यवहार कानून के शासन की रक्षा नहीं करता, बल्कि उसे कमजोर करता है। आयोग ने सार्वजनिक रूप से नाबालिगों को घुमाने की घटना को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि किसी बच्चे को इस तरह दंडित करना उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकता है।
आयोग ने कहा कि किसी नाबालिग को सड़कों पर सार्वजनिक रूप से घुमाना उसे समाज के सामने अपराधी के तौर पर पेश करने और उसकी गरिमा को चोट पहुंचाने जैसा है। यह किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में निर्धारित सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत है। आयोग ने कहा कि पुलिस की ऐसी कार्रवाई संविधान, बच्चों के अधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय दायित्वों और मानवीय गरिमा के खिलाफ है।
आयोग ने यह भी कहा कि बच्चों जैसे कमजोर वर्गों की रक्षा करना राज्य का दायित्व है। जब कानून लागू करने वाले अधिकारी अपनी शक्ति का इस्तेमाल किसी बच्चे को प्रताड़ित करने के लिए करते हैं, तो वे कानून के शासन को लागू करने के बजाय उसे ही ध्वस्त करते हैं।
आयोग ने पुणे पुलिस के कामकाज को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की। उसने कहा कि महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों की तुलना में पुणे पुलिस आयुक्तालय से पुलिस की कथित ज्यादतियों और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी कई शिकायतें उसके सामने आई हैं।
आयोग के मुताबिक कानून का शासन मांग करता है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां कानूनी सीमाओं के भीतर काम करें, नागरिकों के साथ समान व्यवहार करें और उनके मानवाधिकारों की रक्षा करें। पुणे पुलिस के मामले में यह संतुलन कायम होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है।
जांच रिपोर्ट में आठ बच्चों के साथ कई दिनों तक कथित तौर पर अत्यधिक क्रूरता किए जाने की बात सामने आने पर आयोग ने कहा कि यह केवल कुछ पुलिसकर्मियों की गलती का मामला नहीं है, बल्कि शीर्ष स्तर पर जिम्मेदारी निभाने में विफलता का भी गंभीर प्रश्न उठाता है। आयोग ने तथ्यात्मक जांच समिति की रिपोर्ट को विस्तृत, निष्पक्ष और दस्तावेजों से समर्थित बताया तथा उसके निष्कर्षों से प्रथम दृष्टया सहमति जताई।
मामले में किशोर न्याय बोर्ड की भूमिका पर भी आयोग ने सवाल उठाया। आयोग ने कहा कि बोर्ड के अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने बच्चों ने अपने साथ कथित दुर्व्यवहार और मारपीट की शिकायत की थी, लेकिन इसके बावजूद FIR दर्ज कराने का आदेश नहीं दिया गया। आयोग ने इस पहलू को भी गंभीरता से लेते हुए अपने आदेश की प्रति उचित कार्रवाई के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को भेजने का निर्देश दिया।
मानवाधिकार आयोग ने मामले में आगे की कार्रवाई की निगरानी के लिए सुनवाई 26 अक्टूबर तक स्थगित की। अब पुलिस महानिदेशक को आयोग की सिफारिश के आधार पर कार्रवाई और जांच की प्रगति से अवगत कराना होगा।