हिरासत की अवधि बताए बिना NSA के तहत जारी आदेश अवैध, बाद का आदेश भी खामी दूर नहीं कर सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत जारी हिरासत आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया हो कि आदेश कितनी अवधि तक प्रभावी रहेगा तो ऐसा आदेश कानून की नजर में टिकाऊ नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिरासत की अवधि का उल्लेख न करना महज प्रक्रियात्मक अनियमितता नहीं, बल्कि आदेश की वैधता को प्रभावित करने वाली गंभीर खामी है।
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने कहा कि बाद में हिरासत की अवधि बढ़ाने का आदेश जारी करके शुरुआती आदेश की इस मूलभूत कमी को दूर नहीं किया जा सकता। बाद का आदेश ऐसे आदेश को पिछली तारीख से वैधता प्रदान नहीं कर सकता, जो शुरुआत से ही अवैध था।
कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में यह स्वीकार किया गया कि शुरुआती हिरासत आदेश में हिरासत की अवधि का उल्लेख नहीं था। यह कमी आदेश की वैधता से जुड़ी है और इसे केवल प्रक्रियात्मक अनियमितता नहीं माना जा सकता। इसलिए ऐसी मूलभूत खामी वाला हिरासत आदेश कानून के तहत कायम नहीं रखा जा सकता और बाद में जारी आदेश से इसकी भरपाई भी नहीं हो सकती।
याचिकाकर्ता ने 30 अप्रैल, 2026 और 30 जुलाई, 2026 को जारी आदेशों को चुनौती देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। याचिका में दलील दी गई कि हिरासत से जुड़े आदेश अवैध हैं और कानून के प्रावधानों के विपरीत जारी किए गए।
मामले के तथ्यों के अनुसार, इंदौर निवासी याचिकाकर्ता के खिलाफ 37 आपराधिक मामले दर्ज हैं। उसके विरुद्ध 14 निवारक कार्यवाहियां और एक जिला बदर की कार्यवाही भी की गई। इसके बाद इंदौर के जिला मजिस्ट्रेट ने अप्रैल 2026 में जिला बदर का आदेश जारी किया और जुलाई में इसे तीन महीने की अवधि के लिए बढ़ा दिया।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पहले जारी आदेश में उस अवधि का उल्लेख नहीं था, जिसके लिए याचिकाकर्ता को हिरासत में रखा जाना था। इस कारण आदेश की वैधता प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की हिरासत की पुष्टि के लिए केंद्र सरकार को 8 मई, 2026 को भेजा गया पत्र कानून में निर्धारित सात दिन की अवधि समाप्त होने के बाद भेजा गया था। इससे अनिवार्य वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हुआ।
राज्य सरकार की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि केंद्र सरकार को 8 मई, 2026 को सूचना भेजने में कथित तौर पर केवल एक दिन की देरी हुई। इसे ऐसी अनुचित देरी नहीं माना जा सकता, जिससे हिरासत आदेश अवैध हो जाए। राज्य ने यह भी दलील दी कि भले ही शुरुआती आदेश में हिरासत की अवधि का उल्लेख नहीं था, लेकिन जुलाई में जारी बाद के आदेश में याचिकाकर्ता की हिरासत को तीन महीने के लिए बढ़ाने की बात स्पष्ट कर दी गई।
हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) की धारा 3 के प्रावधानों की जांच की। कोर्ट ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त द्वारा जारी हिरासत आदेश लिखित होना चाहिए और उसमें उस अवधि का स्पष्ट उल्लेख होना अनिवार्य है, जिसके लिए आदेश प्रभावी रहेगा।
खंडपीठ ने पाया कि शुरुआती आदेश में हिरासत की अवधि निर्दिष्ट नहीं की गई। इसलिए आदेश में कानूनी खामी थी, जिसे बाद में हिरासत की अवधि बढ़ाने वाला आदेश जारी करके दूर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी NSA की धारा 3(3) और 3(5) में निर्धारित अनिवार्य आवश्यकताओं के अनुपालन को साबित करने में विफल रहे। ऐसे में विवादित हिरासत आदेश और उसके आधार पर की गई परिणामी कार्रवाई को कानून की नजर में कायम नहीं रखा जा सकता।
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार की और 30 अप्रैल, 2026 तथा 30 जुलाई, 2026 को जारी हिरासत संबंधी आदेशों को रद्द किया।