मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पति और उसके परिजनों के खिलाफ क्रूरता के आरोप में दर्ज FIR रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि FIR दर्ज करने में हुई देरी को मात्र इस आधार पर काउंटरब्लास्ट नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी वैवाहिक जीवन बचाने की उम्मीद में धैर्य रखते हुए चुप रहती है और बाद में ससुराल वालों के व्यवहार में सुधार न होने पर शिकायत दर्ज करती है, तो उसकी चुप्पी को उसकी कमजोरी नहीं माना जा सकता।

जस्टिस विशाल मिश्रा ने कहा कि यदि पत्नी अपना वैवाहिक जीवन बचाने के उद्देश्य से धैर्य रखती है और चुप रहती है तो उसके इस आचरण को उसकी कमजोरी नहीं कहा जा सकता। इसके विपरीत, यह उसके वैवाहिक जीवन को बचाने की ईमानदार कोशिश और गंभीर प्रयास को दर्शाता है। जब उसे यह महसूस होता है कि ससुराल वालों के व्यवहार में सुधार नहीं हुआ है और समझौते की कोई संभावना नहीं बची है, तब उसके द्वारा क्रूरता की शिकायत के संबंध में एफआईआर दर्ज कराना केवल देरी के आधार पर काउंटरब्लास्ट नहीं कहा जा सकता।

मामले में पति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने और उसके परिजनों के खिलाफ दर्ज FIR तथा उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की। आरोप पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा पत्नी के साथ क्रूरता करने से संबंधित थे। मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए अथवा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 के साथ दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत आरोप लगाए गए।

पति की ओर से दलील दी गई कि विवाह 26 जनवरी 2025 को हुआ, लेकिन पत्नी 18 मार्च 2025 से अपने मायके में रह रही थी। इसके बाद उसने 12 मई 2026 को यानी करीब 14 महीने बाद पति, ससुर और सास के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

पति की ओर से यह भी कहा गया कि विवाह के समय हुए खर्चों के बिल अदालत के समक्ष पेश किए गए हैं, जिनसे पता चलता है कि इन खर्चों का भुगतान याचिकाकर्ताओं ने किया था। यह भी दलील दी गई कि पत्नी के माता-पिता से कभी कार या चार पहिया वाहन की मांग नहीं की गई।

याचिकाकर्ताओं ने आरोपों को सामान्य और व्यापक प्रकृति का बताते हुए कहा कि पत्नी के स्त्रीधन और विवाह के समय दिए गए अन्य सामान उसके पास ही हैं। इसलिए उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई आधार नहीं है।

वहीं, पत्नी की ओर से इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा गया कि ससुराल पक्ष ने शुरुआत से ही उसे प्रताड़ित किया। उसके माता-पिता ने विवाह में करीब 60 से 70 लाख रुपये खर्च किए थे और 15 लाख रुपये नकद के अलावा अन्य सामान भी दिया था।

पत्नी की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि हनीमून के दौरान पति ने उससे पैसों की मांग की। उसने उस समय 50 हजार और 10 हजार रुपये दिए। पत्नी की ओर से कहा गया कि उस समय समझौते की संभावना बनी हुई थी और वह वैवाहिक विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रही थी। इसी वजह से उसने तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं कराई।

हाईकोर्ट ने सुप्रिया जैन बनाम हरियाणा राज्य मामले का उल्लेख करते हुए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र के दायरे को भी दोहराया।

कोर्ट ने पति की ओर से FIR में हुई देरी को आधार बनाकर की गई दलील को स्वीकार नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी ने अपनी धारा 180 और 183 के तहत दर्ज बयानों में स्पष्ट रूप से आरोप लगाया है कि याचिकाकर्ताओं ने उसके साथ क्रूरता की और दहेज की मांग की।

कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्यों और सामग्री का परीक्षण ट्रायल कोर्ट द्वारा किया जाना चाहिए। इस स्तर पर धारा 482 के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल FIR दर्ज करने में हुई देरी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शिकायत काउंटरब्लास्ट के रूप में दर्ज की गई। कोर्ट ने FIR रद्द करने का कोई आधार नहीं पाया और पति की याचिका खारिज की।

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