केन-बेतवा लिंक परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों और सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा। अदालत ने सरकार से पूछा कि समिति की रिपोर्ट के बाद अब तक क्या कार्रवाई की गई है और इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में चल रही कार्यवाही की स्थिति क्या है।

मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी।

चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोग्जे और जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में केन-बेतवा लिंक परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व, केन घड़ियाल अभयारण्य और परियोजना से विस्थापित होने वाले लोगों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि जिन मुद्दों पर पहले से सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है, उन पर समानांतर कार्यवाही शुरू करना उचित नहीं होगा। खंडपीठ ने उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट नदी जोड़ो परियोजनाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट पर विचार कर रहा है।

अदालत ने कहा कि जब कोई सुप्रीम कोर्ट पूरे मामले और देशभर की नदी जोड़ो परियोजनाओं पर विचार कर रही हो तो हाईकोर्ट के लिए ऐसे आदेश पारित करना उचित नहीं होगा, जो उस कार्यवाही से टकरा सकते हैं।

केंद्रीय समिति की रिपोर्ट में पर्यावरणीय चिंताओं का उल्लेख

याचिकाकर्ता अरिहंत तिवारी ने स्वयं अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने वर्ष 2019 में सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में परियोजना की वन्यजीव संबंधी मंजूरी, पर्यावरणीय प्रभावों और प्रभावित होने वाली वन भूमि तथा वन्यजीवों के आवास को लेकर चिंताएं जताई थीं।

उन्होंने अदालत को बताया कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की ओर से दी गई वन्यजीव संबंधी मंजूरी को राष्ट्रीय हरित अधिकरण में चुनौती दी गई। बाद में अधिकरण ने मामला सुप्रीम कोर्ट को भेज दिया, जिसने इसे केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति के पास विचार के लिए भेजा है।

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन दाखिल किया गया।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि परियोजना के संबंध में उसके निर्देशों का पालन हुआ है या नहीं। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी विशिष्ट उदाहरण या साक्ष्य के बिना यह मान लेना उचित नहीं होगा कि राज्य सरकार या संबंधित अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं।

अदालत ने कहा,

“जब तक ऐसे विशिष्ट उदाहरण सामने नहीं आते, हम यह नहीं मान सकते कि निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है।”

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट में परियोजना को पूरा करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया निर्धारित की गई, लेकिन उसका पालन नहीं किया जा रहा है। इस पर पीठ ने कहा कि जब उच्चतर अदालत उसी विषय पर विचार कर रही है तो संबंधित कार्रवाई की उचित जांच उसी मंच पर होनी चाहिए, जिसके आदेश के तहत वह कार्रवाई की गई है।

प्रभावित लोगों के लिए अलग समिति बनाने की मांग खारिज

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने परियोजना से प्रभावित लोगों की शिकायतों के समाधान के लिए अलग समिति गठित करने की मांग भी की। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि ऐसी समिति बनाने से शिकायतों के निपटारे की एक समानांतर व्यवस्था खड़ी हो सकती है।

खंडपीठ ने राज्य सरकार की मंशा पर संदेह जताने से भी इनकार किया। अदालत ने कहा कि किसी ठोस उदाहरण के बिना यह मानने का कोई कारण नहीं है कि राज्य सरकार केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट के विपरीत कदम उठाएगी।

हाईकोर्ट ने अब राज्य सरकार से सुप्रीम कोर्ट में लंबित कार्यवाही की स्थिति स्पष्ट करने और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट के संबंध में की गई कार्रवाई का ब्योरा देने को कहा है। अदालत ने सरकार को भारत में जल संघर्षों पर नीति संवाद मंच की ओर से 21 जनवरी 2022 को जारी पत्र पर भी अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी।

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