इंदौर में ध्वनि प्रदूषण पर हाईकोर्ट सख्त, हर वार्ड में दो स्वयंसेवक तैनात करने के निर्देश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर में बढ़ते ध्वनि प्रदूषण पर सख्त रुख अपनाते हुए शहर के हर वार्ड में दो स्वयंसेवक नियुक्त करने के निर्देश दिए। ये स्वयंसेवक अपने क्षेत्र में तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाने वाले लोगों और वाहनों की जानकारी तुरंत पुलिस को देंगे। वे अपने मोबाइल फोन से घटना का वीडियो भी बना सकेंगे, ताकि शिकायत पर कार्रवाई करने में पुलिस को मदद मिल सके।
जस्टिस सुभोद अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने कहा कि पिछले साल त्योहारों के दौरान शहर में ध्वनि प्रदूषण बेकाबू रहा और पुलिस इसे रोकने में पूरी तरह असहाय नजर आई। अदालत ने निर्देश दिया कि प्रत्येक पुलिस थाने का थाना प्रभारी अपने क्षेत्र के हर वार्ड से दो स्वयंसेवकों को नियुक्त करे। इससे उन नागरिकों को भी शिकायत करने में आसानी होगी, जो सीधे पुलिस से संपर्क करने में हिचकिचाते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी शिकायत मिलने पर पुलिस कानून के अनुसार तुरंत कार्रवाई करे।
यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता ने दायर की। याचिका में कहा गया कि इंदौर में अनियंत्रित ध्वनि प्रदूषण नागरिकों के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है। इसमें शांतिपूर्ण नींद के अधिकार को भी शामिल बताया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, तेज आवाज का सबसे अधिक असर बुजुर्गों, बच्चों और लंबे समय से बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर पड़ता है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि शहर में कई स्थानों पर सुबह छह बजे से आधी रात तक लाउडस्पीकर बजाए जाते हैं और कभी-कभी इसके बाद भी तेज आवाज जारी रहती है। इससे ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का उल्लंघन होता है, लेकिन प्रशासन की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही है।
हाईकोर्ट ने इससे पहले राज्य सरकार को निर्देश दिया कि शहर के शांति क्षेत्रों की सूची व्यापक प्रसार वाले दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित की जाए। हालांकि, पिछली सुनवाई में राज्य की ओर से ऐसे समाचार पत्रों के अंश प्रस्तुत किए गए, जिनमें शांति क्षेत्रों का उल्लेख था। अदालत ने इसे अपने निर्देश का उचित पालन नहीं माना।
खंडपीठ ने दोबारा निर्देश दिया कि शांति क्षेत्रों की सूची प्रकाशित की जाए और प्रमुख स्थानों को शांति क्षेत्र घोषित करने के लिए आम लोगों से सुझाव भी आमंत्रित किए जाएं, ताकि ऐसे स्थानों को भी सूची में शामिल किया जा सके, जो पहले इसमें जगह नहीं पा सके थे।
सुनवाई के दौरान सहायक पुलिस आयुक्त ने अदालत को बताया कि ध्वनि प्रदूषण मापने वाले उपकरणों का इस्तेमाल उल्लंघन दर्ज करने या कार्रवाई करने के लिए नहीं किया गया। इस पर अदालत ने कहा कि ऐसे उपकरण तभी उपयोगी होंगे, जब उन्हें ध्वनि प्रदूषण की शिकायतों पर कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों को उपलब्ध कराया जाए।
हाईकोर्ट ने इंदौर के प्रत्येक पुलिस थाने के पुलिसकर्मियों को ध्वनि मापने वाले उपकरण उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि संबंधित थाने का संपर्क नंबर समाचार पत्रों और इंदौर पुलिस की वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाए, ताकि ध्वनि प्रदूषण से परेशान नागरिक तुरंत शिकायत कर सकें।
अदालत ने पिछले वर्ष नवरात्रि और दशहरे के दौरान शहर में हुए ध्वनि प्रदूषण पर भी चिंता जताई। खंडपीठ ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि शहर के विभिन्न पुलिस थानों में ध्वनि प्रदूषण को लेकर मिली शिकायतों का ब्योरा अदालत में पेश किया जाए। इसके साथ ही पुलिस ने स्वयं ध्वनि प्रदूषण का संज्ञान लेकर यदि कोई शिकायत या मामला दर्ज किया हो, तो उसकी जानकारी भी प्रस्तुत करने को कहा गया।
हाईकोर्ट ने इंदौर नगर निगम को अपने कचरा संग्रहण वाहनों पर बजाए जाने वाले स्वच्छता गीत की आवाज कम करने का भी निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि इन वाहनों पर बजने वाले गीत की आवाज निर्धारित डेसीबल सीमा के भीतर रखी जाए या कम से कम मौजूदा आवाज को 25 प्रतिशत तक घटाया जाए।
इससे पहले भी हाईकोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए राज्य सरकार की ओर से उठाए गए कदमों पर असंतोष जताया था। अदालत के ताजा निर्देशों का उद्देश्य ध्वनि प्रदूषण की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करना और शहर के नागरिकों को तेज आवाज से होने वाली परेशानी से राहत दिलाना है।