'गृहणी परिवार को कई तरह की सेवाएं देती है, वह अकुशल मज़दूर नहीं': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दुर्घटना में महिला की मौत के बाद मुआवज़ा बढ़ाया

Update: 2026-03-31 12:13 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दुर्घटना में जान गंवाने वाली महिला के परिजनों को दिए गए मुआवज़े की राशि बढ़ाई। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि गृहणी के योगदान को किसी अकुशल मज़दूर के काम के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह बिना किसी तय समय या छुट्टी के परिवार के लिए कई तरह की सेवाएं करती है।

कोर्ट ने कहा कि उचित मुआवज़ा तय करते समय इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने मुआवज़े की राशि बढ़ाकर 12 लाख रुपये से ज़्यादा कर दी।

जस्टिस हिरदेश की बेंच ने यह फ़ैसला सुनाया:

"आय के आकलन के संबंध में क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने मृतक की आय 3,500 रुपये प्रति माह आंकी थी। इसका आधार यह था कि मृतक की आय के संबंध में कोई दस्तावेज़ी सबूत पेश नहीं किया गया। हालांकि, रिकॉर्ड से पता चलता है कि मृतक एक महिला होने के साथ-साथ एक गृहणी भी थी। एक गृहणी के योगदान को किसी अकुशल मज़दूर के काम के बराबर नहीं माना जा सकता। एक गृहणी परिवार के लिए कई तरह की सेवाएँ करती है और बिना किसी तय समय या छुट्टी के पूरे घर-परिवार को संभालती है। इन सेवाओं के आर्थिक मूल्य को अदालतों ने हमेशा मान्यता दी है और उचित मुआवज़ा तय करते समय इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।"

कोर्ट मृतक ममता के परिवार द्वारा मोटर वाहन अधिनियम की धारा 173(1) के तहत दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था। इस अपील में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (Motor Accident Claims Tribunal) द्वारा 28 फरवरी 2019 को दिए गए फ़ैसले को चुनौती दी गई और मुआवज़े की राशि बढ़ाने की मांग की गई।

ट्रिब्यूनल ने मृतक की मौत के मामले में 6,97,200 रुपये का मुआवज़ा और उस पर ब्याज देने का आदेश दिया। अपीलकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने मृतक की आय का आकलन काफ़ी कम किया था।

बेंच ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने मृतक की आय 3,500 रुपये प्रति माह इस आधार पर आंकी थी कि उसकी आय के संबंध में कोई दस्तावेज़ी सबूत पेश नहीं किया गया। हालांकि, बेंच ने यह भी पाया कि वह एक गृहणी भी थी, जिसके योगदान को किसी अकुशल मज़दूर के काम के बराबर नहीं माना जा सकता।

बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक गृहणी परिवार के लिए कई तरह की सेवाएं करती है, जिसमें बिना किसी तय समय या छुट्टी के पूरे घर-परिवार को संभालना भी शामिल है। इन सेवाओं के आर्थिक मूल्य को अदालतों ने हमेशा मान्यता दी और उचित मुआवज़ा तय करते समय इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, बेंच ने यह माना कि ट्रिब्यूनल ने मृतक की आय ₹3,500 प्रति माह आंकने में गलती की थी।

बेंच ने आगे यह भी कहा,

"भले ही ब्यूटीशियन के काम से होने वाली आय का कोई पक्का दस्तावेज़ी सबूत मौजूद न हो, फिर भी उसकी आय को कम-से-कम 'न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम' (Minimum Wages Act) के तहत एक 'अर्ध-कुशल महिला' (semiskilled lady) के स्तर पर आंका जाना चाहिए, जो उस समय ₹5,975 प्रति माह थी।"

इसलिए बेंच ने मुआवज़े की उचित और सही राशि ₹12,20,720/- तय की। इस तरह यह निर्देश दिया कि पहले से दी गई राशि के अतिरिक्त ₹5,23,520/- का अतिरिक्त मुआवज़ा दिया जाए।

इस प्रकार, अपील में संशोधन किया गया और उसे आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।

Case Title: Manoj v Arvind Kumar Jha [MA-2978-2019]

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