सरकारी कर्मचारियों को ट्रांसफर या अटैचमेंट ऑर्डर के ज़रिए परेशान नहीं किया जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ग्राम रोज़गार सहायक का ट्रांसफर ऑर्डर रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को अटैचमेंट या सज़ा के तौर पर किए गए ट्रांसफर के ज़रिए परेशान नहीं किया जा सकता। अगर सरकार किसी कर्मचारी का ट्रांसफर प्रशासनिक कारणों से करना चाहती है तो सबसे अच्छा तरीका ट्रांसफर पॉलिसी का पालन करना है।
जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की बेंच ने पाया कि शुरुआती जांच और उसके बाद आई जांच रिपोर्ट से यह साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोप सही हैं।
बेंच ने कहा,
"इसलिए किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को अटैचमेंट या ट्रांसफर के ज़रिए परेशान नहीं किया जा सकता। अगर सरकार किसी कर्मचारी का ट्रांसफर प्रशासनिक कारणों से करना चाहती है तो ट्रांसफर पॉलिसी के तहत यह विकल्प हमेशा उपलब्ध रहता है।"
यह याचिका रतन बसई गांव के ग्राम रोज़गार सहायक अशोक सिंह ने दायर की थी। उन्होंने जनपद पंचायत के 8 मई, 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनका ट्रांसफर ज़िला मुरैना से जनपद पंचायत पोरसा कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि 8 मई, 2026 का विवादित आदेश, राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के 4 मई, 2024 के उस सर्कुलर का उल्लंघन करता है, जो अटैचमेंट के संबंध में जारी किया गया। याचिकाकर्ता ने आगे दावा किया कि GAD के कई सर्कुलरों में साफ तौर पर कहा गया कि अटैचमेंट की अनुमति नहीं है। याचिकाकर्ता ने यह भी ज़ोर देकर कहा कि ट्रांसफर पॉलिसी के अनुसार भी अटैचमेंट की अनुमति नहीं है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि विवादित आदेश सज़ा देने के मकसद से पारित किया गया, जबकि नियम साफ हैं कि ऐसा करना स्वीकार्य नहीं है।
कोर्ट ने पाया कि 8 मई, 2026 का विवादित आदेश पहली नज़र में GAD के सर्कुलर और ट्रांसफर पॉलिसी के विपरीत प्रतीत होता है, जिनमें अटैचमेंट की अनुमति नहीं है। बेंच ने 'सोमेश तिवारी बनाम भारत संघ' (2009) 2 SCC 592 मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि ट्रांसफर ऑर्डर या अटैचमेंट को सज़ा के तौर पर पारित नहीं किया जा सकता।
ट्रांसफर पॉलिसी के नियम 52 के अनुसार, किसी भी तरह के अटैचमेंट की अनुमति नहीं है। याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई शिकायत के संबंध में कोर्ट ने पाया कि एक शुरुआती जांच की गई, लेकिन उससे यह साबित नहीं हुआ कि याचिकाकर्ता पर लगाए गए कोई भी आरोप सही थे। इस प्रकार, बेंच ने यह माना कि किसी सरकारी कर्मचारी को ट्रांसफर या अटैचमेंट के ज़रिए परेशान नहीं किया जा सकता। यदि सरकार किसी कर्मचारी का ट्रांसफर करना चाहती है तो यह ट्रांसफर पॉलिसी के तहत ही संभव है।
तदनुसार, अदालत ने याचिका स्वीकार की, विवादित आदेश रद्द किया और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को उसकी वर्तमान पोस्टिंग की जगह पर ही अपने कर्तव्यों का पालन जारी रखने की अनुमति दें। हालाँकि, अदालत ने प्रतिवादियों को याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की भी स्वतंत्रता दी।
Case Title: Ashok Singh v State of Madhya Pradesh, WP-18968-2026